वर्तमान गतिविधियां

RJM/708 Date 12.05.2022

श्री नीतिन गडकरी,
भूतल परिवहन मंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- जयपुर दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग 48 के सम्बन्ध में।

महोदय,
जयपुर दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 को 15 वर्ष पहले 4 लेन से 6 लेन बदलने का कार्य प्रारम्भ हुआ था जो आज-तक पूरा नही हुआ है। आप जब 2014 में भूतल परिवहन मंत्री बने थे तब आपने इस राष्ट्रीय राजमार्ग का निरीक्षण किया था और सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि मार्च 2015 तक इस हाईवे का समस्त कार्य पूर्ण कर दिया जायेगा। लेकिन यह बड़ा ही विचारणीय विषय है कि इस हाईवे का कार्य अभी तक पूरा नही हुआ है। इस हाईवे पर चन्दवाजी से कोटपूतली के मध्य नालों पर बनी चार-पांच पूलिया अभी भी चार लेन है और गिरने की स्थिति में भी है। शाहपुरा का फ्लाई ऑवर आज भी नही बन पाया है और वहां पर कुछ स्ट्रक्चर बने हुए है जो यातायात को बाधित करते है। इस हाईवे के सर्विस लेन, नालिया और मध्य के डिवाईडर बिलकूल ही टूटे हुए है तथा डिवाईडर पर पौधे भी नष्ट हो गये है और जंगली घास उगी हुई है। यद्यपि यह हाईवे देश का सबसे व्यस्तŸाम इाईवे है लेकिन इसकी दुरर्दशा देश के अधिकांश राष्ट्रीय राजमार्गों से निकृष्ट है। उल्लेखनीय है कि इस हाईवे पर 15 साल से 6 लेन का टौल वसूला जा रहा है।
नेशनल हाईवे एथोरिटी के एक वरिष्ठŸाम अधिकारी से इस हाईवे की दुरर्दशा के सम्बन्ध में चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि इस हाईवे के संचालक/मालिक के विरूद्ध एथोरिटी कोई भी कार्यवाही करने में अक्षम है क्योंकि संचालक प्रधानमंत्री और भूतल परिवहन मंत्री से नीचे के स्तर के प्राधिकारियों से कोई बात नही करता और हाईवे एथोरिटी को कुछ भी नही समझता।
आपकी एक विजनरी कार्यकुशल एवं स्वच्छ छवि है लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि इस राष्ट्रीय राजमार्ग की दुरर्दशा से आपकी छवि धूमिल हो रही है।
आशा है आप इस हाईवे की दुरर्दशा की स्थिति का नोटिस लेंगे और इसको यथाशीघ्र दुरस्त करवायेगे। सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष, राजस्थान जाट महासभा

 

दिनांक 11.05.2022

उपाध्यक्ष,
नीति आयोग,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- देश में जल प्रबन्धन की समुचित व्यवस्था के सम्बन्ध में।

महोदय,
जैसे ही गर्मी के दिन आये देश के अधिकांश क्षेत्रों में पेयजल की कील्लत मची हुई है। एक-एक जल स्त्रोत पर हजारों लोग पानी के बर्तनों को लेकर दिन-रात लाईन में खड़े है। पूराने वक्त में पेयजल के स्त्रोत भूमिगत कुएं, तालाब, बावड़ी इत्यादि थे जो भू-गर्भ का जल खत्म होने से सुख गये है। भारत सरकार और राज्य सरकारे घर-घर में नल से पानी देने की बात कर रहे है लेकिन इस तथ्य को नही देखा जा रहा है कि इन नलों में पानी कहां से उपलब्ध होगा। राजस्थान का 80 प्रतिशत भूजल खत्म हो गया है शेष 20 प्रतिशत जल भी धरातल से 400 से 1000 फूट नीचे है जो अगले 10 साल में समाप्त हो जायेगा। राजस्थान में गत सदी के 10वें दशक और इस शताब्दी के पहले दशक में गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले और घर-घर के आगे हैडपम्प लगा दिये, जो अब सुख गये है। अफसोस का विषय है कि सरकारों को इस स्थिति की या तो जानकारी नही है और यदि जानकारी है तो सरकारों ने इसे नजरअन्दाज कर रखा है।
हमारे देश में मानसून की वजह से और हिमालय क्षेत्र में जमी बर्फ की वजह से जल की बहुतायत है लेकिन जल का समुचित एवं संतुलित प्रबन्धन नही है जिसकी वजह से इन्हीं क्षेत्रों में पानी की अधिकायत की वजह से चावल, गन्ना और गेहूँ की फसले की जा रही है तो वही पर पेयजल ही उपलब्ध नही है। मानसूनकाल में देश की अधिकांश नदियां उफान पर बहती है और नदियों के समिपस्थ क्षेत्रों में बाढ़ का आतक एवं विनाश करती है। केन्द्रीय जल आयोग ने पिछली सदी के पांचवें दशक में नदियों के जल का वृह्द एवं मध्यम सिंचाई योजनाओं के लिए मानदण्ड तय किये थे जो वर्तमान आवश्यकता के अनुरूप नही है लेकिन केन्द्रीय जल आयोग उन्हीं मानदण्डों पर आंखे मूंदकर कार्यवाही कर रहा है। कश्मीर और पंजाब की नदियों का अधिकांश जल (70प्रतिशत) सिन्धु जल संधि के तहत पाकिस्तान को दे दिया। इसके बावजूद भारत के हिस्से के 30 प्रतिशत जल का भी भारत पूरा उपयोग नही कर रहा है तथा पंजाब और कश्मीर इस जल को पाकिस्तान की तरफ छोड़ रहे है। चम्बल नदी से 3000 मिलियन क्यूबिक मीटर जल प्रतिवर्ष बहकर गंगा नदी में जाकर पूर्वी यूपी, बंगाल और बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है लेकिन इस जल को राजस्थान को उपयोग करने की अनुमति नही दी जा रही।
अतः हमारे सुझा है किः-
1. सिंधु जल संधि को भंग किया जाकर पुनः संधि की जाये जिसके अन्तर्गत कम से कम 50 प्रतिशत जल हमारे देश के लिए रखा जाये। इस जल का 25 प्रतिशत जल राजस्थान के रेगिस्तान को हरा-भरा करने और पेयजल के लिए दिया जाये।
2. कश्मीर और पंजाब की नदियों का भारत के हिस्से का जल पाकिस्तान में छोड़ा जा रहा है उसको अविलम्ब रोका जावे और राजस्थान के रेगिस्तान में िंसंचाई और पेयजल की व्यवस्था की जावे।
3. चूरू, सीकर, झुझुनूं के लिए यमुना से पेयजल एवं सिंचाई के लिए नहर का प्रावधान है उसे तुरन्त प्रभाव से लागू किये जाने की कार्यवाही की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि सीकर, झुझुनूं में सिंचाई के 2 लाख कुएं है जिन पर 6 हजार करोड़ का निवेश है 20 लाख टन अनाज उत्पन्न होता है 10 लाख लोगों को रोजगार है तथा लाखों टन दूध का उत्पादन हो रहा है इन कुओं का भूगर्भ जल अगले 10 साल सुख जायेगा जिसे निवेश, रोजगार और उत्पादन का भारी नुकसान होगा।
4. नदियों को जोड़ने की योजना के तहत शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात परियोजना का डीपीआर नेशनल वाटर डवलपमेंट एजेन्सी (छॅक्।) ने तैयार कर रखा है। इस योजना के लिए शारदा नदी के अलावा हिमालय से निकलने वाली एक और नदी का पानी उपलब्ध कराकर इसको प्राथमिकता से लागू किया जाये।
5. चम्बल के जल से पूर्वी राजस्थान नहर का प्रारूप राजस्थान की गत सरकार ने तैयार कर अनुमोदन के लिए भारत सरकार को भिजवा रखा है इस नहर को राष्ट्रीय योजना घोषित करने एवं लागू करने लिए पूर्वी राजस्थान में जन आंदोलन का रूप ले रहा है। अतः इस योजना को तुरन्त अनुमोदन कर राष्ट्रीय परियोजना के रूप में लागू किया जाये।

6. जयपुर जिले के दक्षिणी भाग में यमुना के बाढ़ का पानी लाया जाकर भूगर्भ जल को रिचार्ज किये जाने की योजना को लागू किया जाये। उल्लेखनीय है कि इस योजना को लागू करने के लिए भी जन आंदोलन चल रहा है।
7. केन्द्रीय जल आयोग मध्यम एवं वृह्द जल सिंचाई योजनाओं के मानदण्ड जल की वर्तमान सिंचाई, पेयजल एवं उद्योगों के लिए मांग एवं उपयोगिता के अनुरूप बदलाव करें।
8. यद्यपि जल एवं सिंचाई राज्यों का विषय है लेकिन संविधान निर्माताओं ने राज्यों के आपसी स्वार्थ को पहचान करते हुए जल एवं सिंचाई के अधिकार भारत सरकार एवं संसद को भी दिये है। संविधान की 7वीं अनुसूची की प्रथम सूची-संघीय सूची की पृविष्टि संख्या 56 के तहत अर्न्तराज्यीय नदियों पर संसद के विधेयक के अनुमोदन से परियोजना को लागू करने के अधिकार दिये है। अतः अर्न्तराज्यीय नदियों की परियोजनाओं के लिए सम्बन्धित राज्यों की सहमति को दरकिनार कर संसद के अधिनियम से परियोजनाओं को लागू किया जाना चाहिए।
9. हमारे देश में 70 लाख करोड़ के दलहन एवं तिलहन प्रतिवर्ष आयात किये जाते है। राजस्थान राज्य को यदि वर्ष में 2-3 सिंचाई का जल उपलब्ध करा दिया जाये तो राजस्थान अकेला देश की दलहन और तिलहन की आवश्यकता को पूरा कर सकता है और देश को निर्यात की स्थिति में ला सकता है। अतः हिमालयन एवं विध्यांचल सेक्टर की नदियों का बाढ़ का अधिशेष जल राजस्थान में स्थानान्तरित किये जाने की योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
10. माही नदी के जल के सम्बन्ध में राजस्थान एवं गुजरात के मध्य 1965-66 में समझौता हुआ था कि नर्मदा का जल कडाणा बांध के कमाण्ड क्षेत्र में उपलब्ध होने के पश्चात कडाणा बांध का जल राजस्थान को उपलब्ध कराया जाये। गुजरात सरकार ने उस समझौते को लागू करने से मना कर दिया है अतः भारत सरकार संविधान की 7वीं अनुसूची की प्रथम सूची-संघीय सूची की पृविष्टि संख्या 56 के तहत अर्न्तराज्यीय नदियों पर संसद के विधेयक के अनुमोदन से परियोजना को लागू करने के अधिकार के तहत संसद के अधिनियम द्वारा उक्त जल राजस्थान को उपलब्ध कराये।
आशा है नीति आयोग इन सुझावों पर गम्भीरता से विचार करेगा और इन सुझावों पर अमल के लिए भारत सरकार को राय देगा।
यदि सरकार ने जल प्रबन्धन के लिए आमूलचूल, समिचीन, नीतिगत परिवर्तन और क्रियान्वयन नही किया तो अगले 20-30 साल बाद देश में आपातकाल की स्थिति भयंकर रूप ले सकती है।

सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
प्रदेश अध्यक्ष
भारतीय किसान यूनियन

 

BKU/172    02-05-2022

श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषय- पूर्वी राजस्थान नहर प्रयोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने के सम्बन्ध में।

महोदय,
भारत सरकार की नेशनल वाटर डवलपमेंट एजेन्सी द्वारा नदी घाटियों के अधिशेष जल को शुष्क क्षेत्रों में स्थानान्तररित करने के लिए 1982 से काम कर रहा है तथा एजेन्सी ने नदियों को जोड़ने की 23 से अधिक योजनाओं का प्रारूप तैयार कर दिया है।
राजस्थान में चम्बल और उसकी सहायक नदियों से तीन हजार मिलीयन क्यूस्क मीटर पानी बहकर समुद्र में जाता है चम्बल का यह जल यमुना और गंगा के माध्यम से समुद्र में जाता है।
उल्लेखनीय है कि मानसून काल में गंगा नदी स्वयं के जल से ही जल प्रवाहित हो जाती है इसके पश्चात यमुना और चम्बल का जल प्रयागराज के पास यमुना में समाहित होता है तो यह जल गंगा में समाहित नही हो पाता और गंगा के तटबंध तोड़कर पूर्वी यूपी, बिहार और बंगाल में बाढ़ का तांडव करता है। इसके अतिरिक्त हिमालय से आने वाली शारदा, गण्डक, घाघरा, कोसी इत्यादि नदियों का जल भी गंगा में नही समा पाता और बाढ़ की भंयकर स्थिति पैदा करता है जिससे प्रतिवर्ष 10 हजार करोड़ का नुकसान होता है।
इसी परिपेक्ष्य में तथा राजस्थान एक शुष्क प्रदेश होने एवं पानी का नितान्त अभाव होने के कारण पूर्वी राजस्थान नहर प्रयोजना (म्त्ब्च्) को राष्ट्रीय परियोजना की परिकल्पना कर इसका प्रारूप तैयार कर भारत सरकार को अनुमोदन एवं राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने के लिए प्रेषित की गई थी।
इस प्रयोजना से राजस्थान के 13 जिलों में सिंचाई और पेयजल की सुविधा होगी जिससे राजस्थान दलहन और तिलहन के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा और देश की दलहन, तिलहन के आयात पर लगभग 40 लाख करोड़ की बचत होगी। इसके साथ-साथ पूर्वी उŸार प्रदेश, बिहार, बंगाल में गंगा और उसकी सहायक नदियों से होने वाले बाढ़ और उससे होने वाले नुकसान से बचेगे।
यह आश्चर्य का विषय है कि जल शक्ति मंत्री राजस्थान से होते हुए भी इस प्रयोजना को किसान, प्रदेश और देश के हित में नही देखकर राजनैतिक कारणों से इसका अनुमोदन नही करवा करे है। इससे राजस्थान में जन आंदोलन खड़ा हो गया है तथा भारत सरकार के विरूद्ध जनता में विरोध और आक्रोश की स्थिति भी बनी हुई है।
अतः निवेदन है कि राष्ट्रीय हित में पूर्वी राजस्थान नहर प्रयोजना (म्त्ब्च्) को शीघ्र अनुमोदित करे तथा राष्ट्रीय परियोजना के रूप में इसको लागू कराने की कृपा करें।
सादर।
प्रतिलिपिः- श्री अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार
भवदीय

(राजाराम मील)
प्रदेश अध्यक्ष, राजस्थान
भारतीय किसान यूनियन

 

RJM/689 Dated 14.04.2022

श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- राजस्थान की जल एवं सिंचाई परियोजनाओं के सम्बन्ध में।

महोदय,
सन् 2014 में एनडीए सरकार में उमा भारती जी को जल संसाधन मंत्री बनाया गया था। उमा भारती नदियों का जल उपयोग के लिए बांध बनाने एवं सिंचाई परियोजनाओं को लागू करने के पक्ष में नही थी। उनके द्वारा मंत्रालय में समुचित परिणाम नही दिये जाने के कारण उन्हें जल संसाधन मंत्रालय से हटाया गया और श्री नीतिन गडकरी को जल संसाधन मंत्रालय का दायित्व दिया गया। श्री गडकरी ने अल्पसमयावधि में ही नदियों को जोड़ने की तीन-चार परियोजनाओं को लागू करने की स्वीकृति केबीनेट के समक्ष रखी।

राजस्थान की कई वृहद सिंचाई परियोजनाएं भारत सरकार में अनुमोदन/राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने/नदियों को जोड़ने की एक योजना शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजराज निर्णयाधीन है। इस सम्बन्ध में जल शक्ति मंत्री की उदाशीनता की वजह से इस विषय पर राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा में गम्भीर वाद-विवाद, आरोप-प्रत्यारोप चल रहे है जो मीडिया में प्रकाशन के प्रमुख विषय बने हुये है। हम समझते है कि इसका अगले चुनाव में गम्भीर प्रभाव होगा।
राजस्थान की चूरू, सीकर, झुझुनूं परियोजना, शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात परियोजना परियोजना, इर्स्टन राजस्थान केनाल परियोजना इत्यादि को प्राथमिकता के आधार पर अनुमोदन, लागू करना और राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देना अपेक्षित है क्योंकि राजस्थान देश से सबसे शुष्क प्रदेश है। हम ये भी बता दे कि राजस्थान तिलहन और दलहन की पैदावार के लिए उŸाम क्षेत्र है। यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि हमारा देश प्रतिवर्ष 70 लाख करोड़ के तिलहन और दलहन के आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च करता है। यदि राजस्थान की इन योजनाओं को लागू कर दिया जाये तो देश तिलहन और दलहन में आत्मनिर्भर हो जायेगा और देश में 70 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा प्रतिवर्ष बचेगी। यह भी कहना सुसंगत होगा कि चावल, गेहूं और गन्ना उत्पादक प्रदेशों की सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है तो देश के पानी का अनावश्यक उपयोग होगा और इन जिन्सों का आवश्कता से अधिक उत्पादन किसानों और सरकार के लिए परेशानी का कारण बनेगा।

भारत सरकार ने वर्ष 2019-20 के बजट में कॉरपोरेट का टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया जिससे देश को प्रतिवर्ष दो लाख करोड़ का टैक्स की आय कम प्राप्त हो रही है।

हमारा सुझाव है कि कॉरपोरेट टैक्स को पुनः 30 प्रतिशत कर दिया जाये तो भारत सरकार को प्रतिवर्ष 2 लाख करोड़ का टैक्स की आय अधिक होगी जिससे नदियों की जोड़ने की पेयजल एवं सिंचाई की अधिकांश परियोजनाओं को अगले 10 वर्ष में लागू किया जा सकता है जिससे देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ेगा, कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा तथा किसानों की आय भी दुगुनी हो सकती है।

आशा है आप इस मसले को गम्भीरता से लेगे व इस सम्बन्ध में सकारात्मक निर्णय लेगे।

सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

 

RJM/602             Date 03.04.2022

श्री अशोक गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- जाट, अहीर, सैनी, पटेल-पाटीदार, आंजना, बिश्नोई इत्यादि कास्तकार जातियों का विकास बोर्ड के गठन के सम्बन्ध में।

महोदय,
आपके नेतृत्व में राज्य सरकार ने विभिन्न जातियों, समाजों के विकास बोर्ड बनाए हुये है। अभी हॉल ही राज्य सरकार ने विप्र विकास बोर्ड का गठन किया। इसी परिपेक्ष्य में निवेदन है कि जाट जाति सहित अन्य कास्तकार जातियां जिनके अभीतक विकास बोर्ड नही बनाए है उनके लिए भी पृथक-पृथक विकास बोर्डों का गठन किया जाये।
आशा है आप इस सम्बन्ध में यथा शीघ्र विकास बोर्डों का गठन करेंगे।

सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

 

Date 19-2-2022

श्री अशोक गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- प्रदेश में रोजगार भर्तियां और आरक्षण में अनियमितताओं की वजह से प्रदेश के युवाओं में सरकार के प्रति निराशा एवं आक्रोश।

महोदय,
राज्य में एससी, एसटी एवं ओबीसी के आरक्षण में बड़ी भारी अनियमितताऐं हो रही है इन आरक्षित वर्गों को राज्य सरकार की नीति के अनुसार निर्धारित आरक्षण नही दिया जा रहा है। राज्य की ब्यूरोक्रेशी, अधीनस्थ कर्मचारी बोर्ड, राजस्थान लोक सेवा आयोग में आरक्षण विरोधी अधिकारी, कार्मिक एवं अध्यक्ष इस तरह की विकृत प्रक्रिया अपनाते है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी को राज्य की नीति के अनुसार पूरा आरक्षण नही मिले। इसके कुछ नमूने निम्न बिन्दूवार हैः-
1. ओबीसी का आरक्षण 21 प्रतिशत है लेकिन किसी भी भर्ती में कभी भी 21 प्रतिशत रिक्तियां ओबीसी को नही दी जाती। किसी न किसी बहाने ओबीसी की रिक्तियां कम कर दी जाती है जिसकी वजह से ओबीसी का आरक्षण 4-5 प्रतिशत ही रह जाता है।
राज्य सरकार का आरक्षण के रोस्टर सम्बन्ध में 1997 का एक सर्कुलर है जिसके अनुसार प्रत्येक संवर्ग (केडर) के कुल पदों के लिए रोस्टर तैयार किया जाने के निर्देश है। संवर्ग का रोस्टर पूर्ण होने के पश्चात रिपलेसमेंट रूल लागू होता है। यह उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार के किसी भी विभाग में रोस्टर पूर्ण नही है और यदि कहीं पर रोस्टर पूर्ण दिखा भी रखा है तो वह नियमानुसार नही बनाया हुआ है बल्कि कहीं मेरीट के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को आरक्षित वर्ग में दिखा रखा है तो कहीं स्थानान्तरण से आये कार्मिको को आरक्षित वर्ग में दिखा रखा है लेकिन जिस जिले से स्थानान्तरित होकर आये वहा के रोस्टर में कम नही किया।
उक्त समस्या के निदान के लिए 1997 के परिपेत्र को या तो वापिस लिया जाये या उसमें संशोधन कर एससी, एसटी एवं ओबीसी को उनके आरक्षण प्रतिशत के अनुसार रिक्तियां दी जाये। इस समस्या के निदान के लिए यह सुझाव भी है कि एससी, एसटी के लिए बैकलॉग लागू है लेकिन ओबीसी के लिए बैकलॉग लागू नही है इसलिए उक्त सर्कुलरर्स ओबीसी पर लागू नही किया जाये और ओबीसी को 21 प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाये।
2. राजस्थान स्टेट एवं सबोर्डिनेट सर्विसेज (ब्वउइपदमक ब्वउचमजपजपअम म्गंउपदंजपवद थ्वत क्पतमबज त्मबतनपजउमदज) के रूल 15 में प्रावधान है कि प्राम्भिक परीक्षा में प्रत्येक वर्ग के 15 गुणा अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया जायेगा। इस नियम के तहत एससी के 16 प्रतिशत का 15 गुणा, एसटी के 12 प्रतिशत का 15 गुणा, ओबीसी के 21 प्रतिशत का 15 गुणा, एसबीसी के 5 प्रतिशत का 15 गुणा, ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत का 15 गुणा और अनारक्षित के 36 प्रतिशत का 15 गुणा सफल घोषित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि सामान्य श्रेणी अर्थात अनारक्षित श्रेणी में केवल अनारक्षित अभ्यर्थियों को सम्मिलित किया जाता है परिणाम स्वरूप अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी अनुपातिक रूप से बहुत अधिक संख्या में सफल घोषित कर दिये जाते है। जिससे अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की कटऑफ आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से काफी नीचे रह जाती है। हमने आरक्षण अधिकार मंच एवं राजस्थान जाट महासभा के मंच के तहत इस स्थिति का विरोध किया और समानता लाने के लिए लम्बे समय तक संघर्ष किया तो सरकार ने गत वर्ष नियम 15 में संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि जिस श्रेणी के निम्नŸाम कटऑफ होगे उस कटऑफ तक सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जायेगा।
इस संशोधन से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को आंशिक न्याय मिला। लेकिन अभी भी असमानता एवं अन्याय की स्थिति है जो इस प्रकार हैः-
(1) कोई भी ओबीसी का अभ्यर्थी 36 प्रतिशत अनारक्षित और 21 प्रतिशत आरक्षित पदों के लिए कम्पीट करता है जबकि रूल 15 के तहत ओबीसी के 21 प्रतिशत का 15 गुना ही अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित किया जाता है क्योंकि राज्य सरकार ने प्रारम्भिक परीक्षा में आरक्षण लागू नही कर रखा इसलिए ओबीसी को जनरल से अलग श्रेणी में रखना नियम विरूद्ध एवं अनुचित है इसलिए हमारा सुझाव है कि प्रारम्भिक परीक्षा में एससी, एसटी के आरक्षण के प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर दिया जाये और ओबीसी एवं अनारक्षित को सम्मिलित रखते हुए (क्योंकि ओबीसी के अभ्यर्थी भी सामान्य रिक्तियों के लिए कम्पीट करते है) 57 प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाना चाहिए।

3. आरपीएससी द्वारा सिविल सेवा परीक्षा या अन्य भर्तियों में भी साक्षात्कार के लिए लिखित परीक्षा में तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाता है जिसकी वजह से आरक्षित वर्गों को आरक्षित प्रतिशत के तीन गुना तक ही सीमित कर दिया जाता है जबकि अनारक्षित जातियों को सामान्य वर्ग मानकर उन्हें कुल पदों के 36 प्रतिशत के तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर दिया जाता है इस प्रकार आरक्षित और अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सफल घोषित करने में अनुपातिक रूप से काफी असमानता हो जाती है।
निदान
पैरा 2 (1) में उल्लेखित स्थिति एवं सुझाव के अनुकूल ही आरपीएससी द्वारा मुख्य परीक्षा में साक्षात्कार के लिए सफल घोषित किये जाने के मामले में भी अनारक्षित (सामान्य) एवं ओबीसी के अभ्यर्थियों को 36़21त्र57 प्रतिशत का 3 गुना सफल घोषित किया जाना चाहिए।

4. राजस्थान सिविल सेवा परीक्षा में मेरीट से चयनित विद्यार्थियों को सामान्य वर्ग में नियुक्ति नही देना एवं प्रतिक्षा सूचियों को रिसफल नही करनाः- राजस्थान सिविल सेवा परीक्षा में 50 से अधिक सेवाओं के लिए चयन किया जाता है। इस चयन के अन्तर्गत राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आरक्षित वर्गों के मेरीट के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को तो सामान्य संवर्ग में मानकर नियुक्ति दे दी जाती है लेकिन तत्पश्चात की सेवाओं में जिन आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मेरीट के आधार पर सामान्य संवर्ग में नियुक्ति दी जानी चाहिये वे आरक्षण के आधार पर उपर की सेवाओं में नियुक्ति पा जाते है इसलिए आरएएस सेवा को छोड़कर बाकि सभी सेवाओं में मेरीट में आये अभ्यर्थियों को अनारक्षित वर्ग अर्थात सामान्य वर्ग में नियुक्ति नही मिलती। जिसकी वजह से आरक्षित वर्गों को उनके आरक्षण तक सीमित कर दिया जाता है और अनारक्षित पदों से उन्हें वंचित कर दिया जाता है।
इसी प्रकार प्रतिक्षा सूचियों में आरक्षित वर्ग के मेरिट में आये अभ्यर्थी भी प्रथम सूची में आरक्षित वर्ग में नियुक्ति पा जाते है जिसकी वजह से आरक्षित सूची में मेरीट आधार का कोई अभ्यर्थी नही रह पाता। इसके लिए आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी प्रथम सूची में आरक्षित वर्ग में नियुक्ति पा गये उनके स्थान पर नीचे के मेरिट के अभ्यर्थियों को मेरिट में मानकर मेरिट आधार पर नियुक्ति दी जानी चाहिये अर्थात प्रतिक्षा सूचियों को रिसफल किया जाना चाहिए।
5. टीएसपी जिलों में आरक्षित वर्गों को कोई आरक्षण नही है जबकि अनारक्षित वर्गों को 50 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है टीएसपी क्षेत्र की नियुक्तियों में काफी अनियमितताऐं हो रही है
6. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के मामले में विश्वविद्यालयों को युनिट नही माना जाता बल्कि अलग-अलग विषयों और विषयों के अलग-अलग पदों को युनिट मानकर आरक्षित वर्ग को आरक्षण से वंचित किया जा रहा है। सरकार विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक के पदों पर संवर्गवार नीतियों का परीक्षण करे तो यह पाया जायेगा कि एससी, एसटी एवं ओबीसी के प्राध्यापक पांच प्रतिशत से भी कम मिलेगे।
(1) इस समस्या के निदान के लिए सुझाव है कि राज्य सरकार अधिनियम बनाकर एक हाई पावर्ड प्राधिकरण के माध्यम से सभी विश्वविद्यालयों में कुल संवर्गवार (विषयवार नही) रिक्तियां पर नियुक्तियां की जानी चाहिए।
7. न्याय शास्त्र का सामान्य सिद्धान्त है कि भर्तियों में पारदर्शिता होनी चाहिये। संविधान में प्रदत्त नागरिको के मूल अधिकारों प्रमुख्यतः आर्टिकल 14,15,16 का अभिप्राय भी यही है लेकिन भर्ती प्राधिकारी, आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड इत्यादि भर्तियों में बेईमानी, भाई-भतीजावाद एवं अनियमितता के छुपाने के लिये भर्तियों में पारदर्शिता नही रखते। स्थिति यह है कि आरपीएससी के परिणाम में अभ्यर्थी केवल अपने ही प्राप्तांक देख सकता है जबकि किसी भी अभ्यर्थी को समस्त परिणाम, समस्त अभ्यर्थियों के अंक, वरियता इत्यादि देखने की छुट होनी चाहिये।
(1) राज्य की समस्त प्रकार की भर्तियों की परीक्षाओं के अन्तिम परिणाम में सफल अभ्यर्थियों के नाम, प्राप्तांक एवं मेरीट क्रमांक सार्वजनिक रूप से प्रर्दशित की जानी चाहिए।

8. नेशनल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर की स्थापना राजस्थान विधानसभा के एक्ट द्वारा की गई है। मूल अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान था लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन और तत्समय के विधि मंत्री घनश्याम तिवाड़ी ने अधिनियम में संशोधन कर अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान हटा दिया और एससी, एसटी के आरक्षण का प्रावधान भी विश्वविद्यालय की मर्जी पर रख दिया। आरक्षण के सम्बन्ध में राज्य सरकार की स्पष्ट नीति है कि राज्य की सभी विश्वविद्यालय, कॉलेजों में एससी, एसटी एवं ओबीसी का आरक्षण रहेगा और उस स्थिति में नेशनल विधि विश्वविद्यालय इसकी पालना क्यों नही कर रहा है। नेशनल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर छात्रों के प्रवेश एवं शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण तब ही लागू करेगा जब राज्य सरकार विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर आरक्षण के मेन्डेट्री प्रावधान करें।
9. दण्डवत आरक्षण में गलत समायोजनः- राजस्थान सरकार द्वारा महिला, भूतपूर्व सैनिक, विकलांग, खिलाडी एवं मंत्रालयिक कर्मचारियों को दण्डत (होरिजेण्टल) आरक्षण दिया गया है। विभागों के अधिकारी इनके पद सामान्य वर्ग हेतु वर्गीकरण में दिखाते है। राज्य सरकार का नियम है कि पांच पदों तक सभी पद अनारक्षित वर्ग के होते है। सबका चयन मेरिट आधार पर किया जाता है, लेकिन सबसे ऊपर मेरिट में आने वालों को जाति देखकर आरक्षित वर्ग में तथा मेरिट के अन्त में चयन होने वाले अभ्यर्थियो को सामान्य वर्ग में समायोजित कर उनके पद कम किये जाते है। जबकि नियमों में साफ लिखा है कि चयन में जो जिस वर्ग का होगा उसे उसी वर्ग में समायोजित किया जावेगा। यहां सामान्य वर्ग का गलत अर्थ अनारक्षित वर्ग से लगाए जाता है, जबकि सामान्य वर्ग का अर्थ मेरिट आधार पर चयन से है। अतः जब सभी अभ्यर्थियों का चयन मेंरिट आधार पर किया जाता है, तो उन्हे समायोजित भी सामान्य वर्ग (मेरिट) में ही करना चाहिए। यदि अभी चल रही भर्ति परीक्षाओं में मेरिट आधार पर चयनित भूतपूर्व सैनिक, विकलांग, खिलाडी एवं मंत्रालयिक कर्मचारी अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में तथा उससे कम अंक अभ्यर्थियों को ओबीसी , एससी एवं एसटी में समायोजित किया जावें तो प्रत्येक भर्ती में 500 से 1000 आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी और चयन हो सकते है।
10. ओबीसी के आरक्षण को 21 प्रतिशत लागू किये जाने के सम्बन्ध में उपर्युक्त पेराओं में बताई गई प्रक्रिया के अतिरिक्त एससी, एसटी की तरह बैकलॉग लागू किया जाये।
11. सरकार एवं भर्ती प्राधिकरणों, आयोग, बोर्ड द्वारा परीक्षा में समूचित प्रक्रिया नही अपनाऐ जाने, सरकार की आरक्षण नीति के अनुसार लागू नही किये जाने एवं परीक्षा के परिणाम में पारदर्शिता नही बनाए जाने के कारण भर्तियों में अनावश्यक लीटिगेशन बढ़ता है जिससे अभ्यर्थियों को तो भारी परेशानियों से तो गुजरना पड़ता ही है बल्कि राज्य सरकार की छवि भी धुमिल होती है जिसका प्रभाव चुनावों में स्पष्ट परिलक्षित होता है।
12. उल्लेखनीय है कि यूपीएससी एवं एसएससी द्वारा की जा रही भर्तियों में कोई अनिमितता नही होती जिसकी वजह से भर्तियां समयानुसार होती है। अतः राज्य सरकार की सभी भर्तियां भी यूपीएससी एवं एसएससी की व्यवस्था के अनुसार आयोजित की जावे।
13. उल्लेखनीय है कि राजस्थान जाट महासभा, आरक्षण अधिकार मंच एवं आरक्षण संवर्गों के संगठन एवं अभ्यर्थी उपर उल्लेखित अनियमितताओं को दूर करने एवं प्रतियोगी परीक्षाओं एवं आरक्षण व्यवस्था में सुधार के लिए लगातार संघर्ष कर रहे है लेकिन सरकार पर कोई प्रभाव दिखाई नही देता बल्कि नकल माफिया, आरक्षण विरोधी ताकतों ने प्रतियोगिता परीक्षाओं, आरपीएससी, अधीनस्थ कर्मचारी बोर्ड और आरक्षण व्यवस्था को हाईजेक कर रखा है जिसका प्रभाव आगामी चुनावों में स्पष्ट नजर आयेगा।

अतः हमारा निवेदन है कि राज्य सरकार दो माह में व्यवस्था में सुधार करे। जो अधिकारी, प्राधिकारी आरक्षण नीति को सही ठंग से लागू नही करता, नियम की जानबुझकर अवहेलना करता है एवं अनियमितता करता है उसके विरूद्ध कठोर दण्डात्मक कार्यवाही की जावे तभी व्यवस्था में सुधार हो सकता है। बेरोजगार युवाओं का आक्रोश चरमसीमा पर है उपर्युक्त समस्याओं का समय पर निदान नही किया गया तो सभी आरक्षित वर्ग संगठित रूप से राज्य सरकार के विरूद्ध एक बड़ा आंदोलन एवं संघर्ष करने को मजबूर होना पड़ेगा। हमारे सेकड़ो कार्यकर्ता आमरण अनशन पर भी बैठने को आमदा है।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

 

दिनांक 23.7.2021

मा0 मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार,
जयपुर

विषयः- कुओं से सिंचित क्षेत्र में जल ग्रहण एवं भूजल पुनर्भरण के सम्बन्ध में।

महोदय,
प्रदेश के जयपुर ज़िले के चौमूं, शाहपुरा क्षेत्र तथा सीकर एवं झुझुनू ज़िले में लगभग दो लाख से अधिक सिंचाई के कुएँ है जिन पर आठ हज़ार करोड़ रूपयों का निवेश है, दस लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ है, बीस लाख टन से अधिक अनाज उत्पादन हो रहा है तथा लाखों टन दूध का उत्पादन भी हो रहा है। लेकिन इस क्षेत्र का भूगर्भीय जल अगले दस पन्द्रह वर्ष में समाप्त हो जाना है जिसका परिणाम सर्वविदित है कि रोज़गार , अन्न दूध उत्पादन सब कुछ ख़त्म हो जाना है तथा निवेश भी बेकार हो जाना है। राज्य सरकार को इस क्षेत्र के रोज़गार और उत्पादन को बचाने के लिए किसी भी किमत पर यथासम्भव उपाय किये जाने चाहिये और इसका एक ही उपाय है चम्बल नदी के जल से भूजल का पुनर्भरण करना।

चम्बल और उसकी सहायक नदियों का अथाह जल समुद्र में बहकर जा रहा है। इस जल को चम्बल नदी घाटी क्षेत्र में संचयन करना संभव नहीं है। इस्टर्न राजस्थान केनाल के निर्माण के बाद भी उपलब्ध जल का 90 प्रतिशत जल बिना उपयोग के रह जावेगा। बाढ़ के जल की सिंचाई की योजनाएँ भी नहीं हो सकती। इसलिए इसका एक ही उपाय है मानसून ऋतु में उपलब्ध बाढ़ के जल को शुष्क क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जावे।
चम्बल के जल को लाखेरी तक नहर के माध्यम से ग्रेविटी फ़ॉलो से लाया जा सकता है। वहाँ से जयपुर की आमेर शाहपुरा तक लिफ़्ट करके लाया सकता है और आमेर शाहपुरा क्षेत्र से ग्रेविटी फ़्लो से सीकर, झुझुनू, चुरू, कोटपुतली, नीमराना, भिवाडी, अलवर, नागौर, अजमेर तक ले ज़ाया जा सकता है।
इस क्षेत्र के प्रत्येक गाँव में चारागाह/जोहड़ है जिन्हें बड़े तालाबों का रूप दिया जाकर जल संग्रहण किया जा सकता है। इससे इस क्षेत्र की भविष्य की, पेय जल इन्डस्ट्रीयल जल की पूर्ति हो सकती है और भूजल का स्तर भी रिचार्ज होकर बना रहेगा।

हमारा निवेदन की इस सुझाव का अध्ययन कराकर वायेबल हो तो इसे मूर्त रूप देने की दिशा में कार्रवाई की जानी चाहिए।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
प्रदेश अध्यक्ष
भारतीय किसान यूनियन

Date 23-7-2021

श्री नवीन महाजन,
प्रमुख शासन सचिव,
जल संसाधन विभाग,
राजस्थान सरकार, जयपुर

विषयः चम्बल के जल का समुचित उपयोग और और जल ग्रहण।

महोदय,
आप जानते ही हैं कि चम्बल और उसकी सहायक नदियों के द्वारा राजस्थान की से एक हज़ार बिलियन क्यूस्क जल निकास होकर व्यर्थ समुद्र में बह जाता है। यह जल जब प्रयागराज में गंगा मे मिलता है तो गंगा और उसकी सहायक नदियां बाढ़ का रूप धारण कर लेती है और यूपी, बिहार और बंगाल में बाढ़ का ताडव करती है लेकिन भारत सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं हैं।
संविधान के तहत जल सिंचाई राज्यों का विषय है। मध्यम और वृहद् सिंचाई परियोजनाओं के लिए राष्ट्रीय जल आयोग, भारत सरकार तथा नदी में जिस राज्य से जल ग्रहण होता है उस राज्य से अनुमति लेनी पड़ती है लेकिन बाढ़ के जल के उपयोग, जल गृहण परियोजना और राज्य सरकार के धन से पोषित योजनाओं को अनुमति के बिना भी बनाई जा सकती हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य मे हमारा सुझाव है किः-

चम्बल की दायीं नहर का जल बूंदी शहर तक आता है इसी नहर की दूसरी ब्रांच लाखेरी तक जाती है। बुंदी से जल को लिफ़्ट करके टोंक ज़िले मे लाया जा सकता है। विकल्प में एक दूसरी नहर के माध्यम से लाखेरी से लिफ़्ट किया जा सकता है। मानसून काल में कोटा बेराज से प्रतिवर्ष काफ़ी मात्रा में जल चम्बल नदी में छोड़ना पड़ता है क्योंकि बेराज की जल संचयन सीमा सीमित है और बेराज का जलाशय भरा ही रहता है। इस बाढ़ के जल को टोंक ज़िले मे लाया जाकर टोंक ज़िले के प्रत्येक गाँव में या बड़े गाँवों में दस दस बीघा भूमि में तालाब बनाकर उनमें जल को संचयन किया जा सकता है। जल ग्रहण परियोजना के तहत उपलब्ध बजट के अनुसार दो दशक में तालाबों का निर्माण किया जा सकता है। प्रदेश मे सोलर एनर्जी का बहुतायत में विकास के बाद थर्मल पावर प्रोजेक्ट भी आईडल हो जाने है इसलिए बिजली की समस्या भी नहीं रहेगी। इस परियोजना को लागू करने पर टोंक ज़िला जल मे आत्मनिर्भर हो जावेगा।

आशा है आप इस सुझाव की वायेबिलिटी पर विचार करेंगे।
भवदीय

(राजाराम मील)
प्रदेश अध्यक्ष
भारतीय किसान यूनियन

RJM/376     Date 22-4-2021

श्री नवीन महाजन,
प्रमुख शासन सचिव,
जल संसाधन विभाग, राज0 सरकार,
जयपुर।

विषयः- चम्बल और उसकी सहायक नदियों के जल के समुचित उपयोग के सम्बन्ध में।

महोदय,
आप जानते ही है कि चम्बल और उसकी सहायक नदियों से वन थाउजेण्ड बिलीयन क्यूस्क जल प्रतिवर्ष बहकर समुद्र में चला जाता है। यह जल प्रयागराज के आगे गंगा नदी में बाढ़ का रूप ले लेता है तथा पूर्वी उŸार प्रदेश, बिहार, और पश्चिम बंगाल में बाढ़ का भयंकर कहर ढाहती है। गत सरकार ने चम्बल और उसकी सहायक नदियों के जल के उपयोग के लिये इस्टन राजस्थान कैनाल की परियोजना का प्रारूप तैयार कर भारत सरकार को भेजा हुआ है और राज्य सरकार की ओर से इस योजना को लागू करने के लिये भारत सरकार को बार-बार लिखा भी जा रहा है।
महेादय, आप एक विजनरी अधिकारी है इसलिये आप चम्बल और उसकी सहायक नदियों के अधिकŸाम उपयोग के लिये कुछ और योजनाओं पर विचार कर सकते है। हाॅल ही आपने चम्बल का जल इशरदा बांध में लाने के लिये भी एक महत्वाकांशी परियोजना की परिकल्पना की है।
हमारा सुझाव है कि चम्बल बैराज से लाखेरी तक चम्बल का जल ग्रेविटी फ्लो से नहर के माध्यम से आ ही रहा है चम्बल बैराज जब बनाया गया था तब उसकी उंचाई जानबुझकर 10-15 फूट नीचे रखी गई थी यह समझकर की उंचाई बढ़ाने से बैराज कभी टूटता है तो कोटा के गढ़ को नूकसान हो सकता है। वर्तमान समय की टेकनोलोजी के परिपेक्ष्य में ऐसी धारणा निराधार है। अतः कोटा बैराज की उंचाई 10-15 फूट बढ़ाई जा सकती है। इससे चम्बल का पानी बनास नदी में लाने के लिये ज्यादा लिफ्ट नही करना पड़ेगा। बरसात के समय में चम्बल का अधिकŸाम जल लिफ्ट के माध्यम से रामगढ़, कालख और अलवर के जयसमंद झील, भिवाड़ी निमराणा इण्डस्ट्रीयल कोरीडोर तक पहुंचाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि शाहपुरा तहसील तक पानी लिफ्ट द्वारा लाने के पश्चात अलवर, सीकर, झुझुनूं, उŸारी पश्चिमी जयपुर, नागौर और सुदूर पश्चिमी जिलो तक जल को ग्रेविटी फ्लो से पहुंचाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में आपके अधीन तकनीकी संसाधन उपलब्ध है तथा आप स्वयं एक विजनरी अधिकारी है अतः आप इस सम्बन्ध में चम्बल के जल का अधिकŸाम उपयोग की योजनाऐं तैयार करें।
अन्तराज्यीय नदियों के जल के उपयोग के लिये वृहद एवं मध्यम सिंचाई परियोजना बनाये जाने के लिये सम्बन्धित राज्यों की सहमति की वजह से देश के अधिकाश उपलब्ध जल की उपयोगिता अटकी हुई है। यद्यपि सिंचाई एवं जल राज्यों के विषय है लेकिन संविधान निर्माता इस सम्बन्ध में भविष्य की कठिनाइयों का अनुमान लगाते हुये संविधान की सातवी अनुसूची की प्रथम
सूची- संघीय सूची की पृविष्टी संख्या 56 के अन्तर्गत संसद को भी अधिकार दिये गये है कि अन्तराज्यीय जल परियोजनाओं के लिये सरकार परियोजना बनाकर संसद से पारित करवाकर लागू कर सकती है। अतः यह भी सुझाव है कि भारत सरकार को उक्त प्रावधान के तहत इस्टन राजस्थान कैनाल को लागू करने पर विचार के लिये अनुशंषा की जानी चाहिये।
आशा है हमारे सुझाव उपयोगी होगे।
सादर।
भवदीय

(महेन्द्र सिंह)                            (राजाराम मील)
संगठन महासचिव                     अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा          राजस्थान जाट महासभा
प्रदेशाध्यक्ष
भारतीय किसान यूनियन

Date: 13-12-2020
राजस्थान जाट महासभा की कार्यकारिणी एवं युवा जाट महासभा की कार्यकारिणी एवं प्रतिनिधियों की एक बैठक आज दिनांक 13.12.2020 को जाट महासभा कार्यालय जयपुर में आयोजित हुई जिसमें राजस्थान के सभी जिलो से महासभा के कार्यकर्ता एवं प्रतिनिधि उपस्थित हुये। बैठक में यह विचार आया कि सरकारे किसानों के हितों के विरूद्ध में काम कर रही है। 23 फसलों की एमएसपी घोषित है लेकिन एमएसपी पर खरीद केवल मात्र गेहूं और धान की होती है और दूसरी फसलों, दलहन एवं तिलहन की खरीद या तो होती ही नही या नाम मात्र की होती है। भारत सरकार का इरादा है कि एमएसपी की व्यवस्था ही समाप्त कर दी जाये। अब कुछ बड़े काॅरपोरेट घराने बीजेपी सरकार से मिलकर कृषि जिन्सों के व्यापार में आ रहे है इसलिये भारत सरकार जब किसानों की जिन्से बाजार में आयेगी उस समय विभिन्न हथकण्डों से किसानों की उपज की कीमत गिराकर काॅरपोरेट को सस्ते भाव पर खरीद की स्थिति बनायेगे। इससे किसान बरबाद हो जायेगे।
बैठक में सर्वसम्मति से यह भी तय हुआ कि भारत सरकार ने कृषि सम्बन्धित तीन कानून बनाये है यह कानून काॅरपोरेट के हित के लिये बनाये है तथा इससे किसानों की हालत बदतर हो जायेगी। देश के किसान इन कानूनों के विरूद्ध बड़े पैमाने पर अभूतपूर्व आंदोलन गत बीस दिन से कर रहे है। यदि इस समय किसानों ने सरकार को इन कानूनों को वापिस लेने के लिये बाध्य नही किया और झुकाया नही तो इस देश में किसानों का कोई वजूद नही रहेगा और सरकार काॅरपोरेट के हित के लिये किसानों का दमन करती रहेगी। अतः राजस्थान जाट महासभा एवं प्रदेश के समस्त किसानों का यह दायित्व बनता है कि किसानों के इस आंदोलन को सहयोग कर सफल बनाये और भारत सरकार को इन किसान विरोधी कानूनों को वापिस लेने के लिये बाध्य करें। प्रतिनिधियों की यह भी राय थी कि यदि भारत सरकार ने इन कानूनों को वापिस नही लिया तो भविष्य में भारत सरकार काॅरपोरेट के हितों के लिये किसानों को बरबाद कर देगी।
इन परिस्थितियों ने राजस्थान जाट महासभा ने यह निर्णय लिया है कि प्रदेश के समस्त किसानों का आव्हान कर दिनांक 20.12.2020 राजस्थान के हजारों किसान और सैकड़ो ट्रेक्टरों के साथ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर शाहजापुर बार्डर पर राष्ट्रीय राजमार्ग को बंद करवायेगे और स्थाई रूप से धरना देगे।
राजस्थान जाट महासभा प्रदेश के समस्त किसानों से आव्हान और आग्रह करती है कि वे किसानों का वजूद बनाये रखने के लिये इस किसान आंदोलन में अधिक से अधिक संख्या में सक्रिय रूप से सम्मिलित होकर प्रदेश में जगह-जगह, सर्वत्र प्रदर्शन, धरने, राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने की कार्यवाही करें तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर शाहजापुर बार्डर पर धरने एवं प्रदर्शन में सम्मिलित होवे।

RJM/351 Date: 03.12.2020
श्री अशोक जी गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- भरतपुर-धौलपुर के जाटो को केन्द्रीय सेवाओं में ओबीसी का आरक्षण प्रदान करने हेतु केन्द्र
सरकार को अभिशंषा भिजवाने बाबत।

महोदय,
निवेदन है कि राजस्थान राज्य पिछड़ा आयोग ने भरतपुर धौलपुर की जाट जाति के पिछड़ेपन के सम्बन्ध में जांच की जिसमें पाया कि भरतपुर धौलपुर की जाट जाति सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी है और आयोग ने इस आशय का प्रतिवेदन राज्य सरकार को प्रस्तुत किया। राज्य पिछड़ा आयोग की उक्त रिपोर्ट को राज्य सरकार ने स्वीकार कर भरतपुर-धौलपुर की जाट जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में अधिघोषित किया। परिणाम स्वरूप भरतपुर-धौलपुर की जाट जाति को राजस्थान सरकार के अन्तर्गत सीधी भर्ती, शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को प्रवेश तथा पंचायतीराज संस्थाओं एवं स्थानीय निकाय संस्थाओं में आरक्षण प्राप्त है।
भारत सरकार और राज्य सरकारों में भारत सरकार के पिछड़ा आयोग अथवा राज्य सरकार के पिछड़ा आयोग की अनुशंषा किसी जाति या वर्ग के पिछड़ेपन के लिये भारत सरकार और राज्य सरकार दोनों में मान्य है तथा ऐसी रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार या राज्य सरकार दोनों में उस जाति को पिछड़ा वर्ग घोषित किये जाने का आधार बनाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय एवं जाट आरक्षण से सम्बन्धित रिटों के मामले में भी राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी ऐसा अभिनिर्णित किया हुआ है।
अतः निवेदन है कि उपरोक्त परिपेक्ष्य में राजस्थान राज्य पिछड़ा आयोग की भरतपुर-धौलपुर के जाट जाति के सम्बन्ध में पिछड़ा होने की प्रतिवेदन 2017 को भारत सरकार को भेजकर भरतपुर-धौलपुर के जाटों को भारत सरकार की सेवाओं के लिये अन्य पिछड़ा वर्ग घोषित करने के लिये अनुशंषा भिजवाने की कृपा करें।
सादर।
भवदीय
(रामवीर सिंह वर्मा) (डाॅ0 प्रेम सिंह कुन्तल) (राजाराम मील)
अध्यक्ष अध्यक्ष अध्यक्ष
भरतपुर-धौलपुर जाट आरक्षण संघर्ष समिति जिला जाट महासभा भरतपुर राजस्थान जाट महासभा
भरतपुर

02.12.2020
श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

मार्फतः- जिला कलेक्टर, जयपुर।

महोदय,
देश के किसान संसद के गत सत्र में पारित कृषि सम्बन्धित तीन विधेयकों को वापिस लेने के लिये संघर्षरत्त है इन विधेयकों का देशभर के किसान विरोध कर रहे है तथा गत छः माह से इन्हें वापिस लेने की गुहार कर रहे है लेकिन आप और आपकी सरकार किसानों की कोई बात सुनने को तैयार नही है और उल्टे किसानों को देशद्रोही, अन्नभिज्ञ और राजनैतिक पार्टियों के बहकावे में बता रहे है। देश के किसानों की अनैक समस्याऐं है यथा भूमि अधिग्रहण में कानून में बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजे देने का प्रावधान होते हुये भी सरकार अधिग्रहित भूमि के बदले किसानों को नाममात्र का मुआवजा देती है। किसानों को उनकी उपज का वाजिम मूल्य नही मिल रहा, उपर से भारत सरकार महगाई रोकने के बहाने आवश्यकता के विपरित अनाप-सनाप कृषि जिन्सों का आयात करके तथा देश की खपत से अधिक उत्पादन के बावजूद निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाकर कृषि जिन्सों की कीमते लगातार गिराने में लगी रहती है। स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने में भी लिपोपोती, दिखावा एवं छलावा किया है। परिणाम स्वरूप देश के किसान आत्महत्या के लिये बाध्य है तथा गरीबी की रेखा के नीचे जा रहे है। किसानों की इस बदहालत पर प्रधानमंत्री जी आपने आजतक चिन्ता प्रकट नही की और आप इधर-उधर की बाते करते रहते है। इन सब वजह से देश के किसान परेशान होकर और मजबूरी में देश के विभिन्न राज्यों से लाखों की संख्या में कुच कर दिल्ली में सरकार के विरूद्ध धरना प्रदर्शन करने के लिये आ रहे थे तो सरकार ने सड़के रोककर किसानों पर लाठीचार्ज, आंसूगेस, ठण्डे पानी की बौछार जैसे निर्दयी अत्याचार किये और किसानों को दिल्ली में प्रदर्शन करने से रोका।
सरकार ने ये कृषि सम्बन्धित विवादस्पद अधिनियम काॅरपोरेट के हित के लिये उनकी सलाह पर बनाये है, किसानों से कोई राय नही की, समुचित विचार के लिये सलेक्ट कमेटी को भी नही भिजवाये तथा बिना बहस के पारित कर दिये। देश के बहुसंख्यक किसानों की मर्जी के विरूद्ध सरकार इन अधिनियमों को वापिस नही लेने की हठधर्मिता अपनाये हुये है और उल्टे किसानों को बदनाम करने में लगी हुई है।
अतः हमारा निवेदन है कि सरकार इन विवादस्पद अधिनियमों को वापिस ले, किसानों से वार्ता कर स्वामीनाथन रिपोर्ट को पूर्णत्या लागू करने तथा एमएसपी पर खरीद की गारंटी का अधिनियम बनाये। दिनांक 3.12.2020 की किसानों के साथ रखी गई वार्ता में कोई नतीजा नही निकलता है तो राजस्थान के किसानों के संगठन लाखों की संख्या में दिल्ली में प्रदर्शन करने एवं धरना देने के लिये रवाना होगे।
सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

9.11.2020
श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- दवाईयों और निजी चिकित्सालयों के चिकित्सा बिल पर नियंत्रण के सम्बन्ध में।

महोदय,
यह सर्वविदित है कि दवाईयों की कीमत लागत मूल्य से सैकड़ों हजारों गुना वसूल की जाती है। गम्भीर बिमारियों में दवाईयों का खर्चा प्रतिदिन 10-20 हजार रूपये तक हो जाता है। इसके उपर निजी चिकित्सालय, चिकित्सा के बदले बड़े भारी बिल वसूल कर रहे है। सरकार को इसके परिणाम का अनुमान लगाना चाहिये और इस पर नियंत्रण करना चाहिये। आजकल गम्भीर बिमारियां अनाप-सनाप बढ़ती जा रही है। इसके अलावा वृद्धावस्था में अधिकांश व्यक्तियों को गहन चिकित्सा सुविधा लेनी पड़ती है। इसका परिणम यह होता है कि सरकार प्रतिवर्ष जितने परिवारों को गरीबी की रेखा से निबारने की कोशिश कर रही है उससे अधिक परिवार चिकित्सा व्यय के कारण भारी आर्थिक बोझ और गरीबी की रेखा से नीचे जा रहे है।
सरकारे, चाहे किसी भी पार्टी की हो और सरकारों का इतिहास रहा है कि किसानों की उपज दाले, प्याज, टमाटर, आलू और अन्य सब्जियां एक दो माह के लिये कीमतों में वृद्धि में वृद्धि हो जाती है तो सरकार तुरन्त एक्शन में आती है और किसानों पर भारी हथोड़े का वार करते हुये कृषि जिन्सों की कीमत गिराने के लिये सब तरह के हथकंडे अपनाकर कीमते गिरा देती है। लेकिन सरकार दवाईयों और निजी चिकित्सा व्यय को नियंत्रित करने और इनकी कीमते वाजिब बनाये रखने के लिये कोई कार्यवाही नही करती और आंखे बंद करके जनता को इस त्रासदि को भूगतने के लिये विवश करती रहती है। यह सरकार के दोहरे चरित्र और मानदण्ड का नमूना है।
अतः सुझाव है किः-
1. सरकार दवाईयों की कीमतों को इस प्रकार नियंत्रित करे कि किसी भी दवाई को मूल्य लागत कीमत से 5-10 गुना से अधिक वसूल नही किया जाये।
2. देश के प्रत्येक जिला स्तर पर सरकारी सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराये जिससे निजी चिकित्सालय भारी भरकम चिकित्सा व्यय वसूल करने से बाज आये।
3. निजी चिकित्सालयों के चिकित्सा व्यय को समुचित रूप से व्यवस्थित किया जावे।

सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

Date 18-10-2018

श्री नरेन्द्र मोदी
प्रधानमंत्री, भारत सरकार,
नई दिल्ली।

विषयः- तुवर एवं उड़द की दाल के आयात का कोटा जारी करने के सम्बन्ध में।

महोदय,
देश में दालों का उत्पादन खरीफ सफल में होता है। किसानों की दालों का उत्पादन अभी बाजार में आ रहा है। यह परिलक्षित है कि किसानों का उत्पादन बाजार में आने पर दालों के उपलब्धता प्रचूर मात्रा में बढ़ जाती है और इसका फायदा उठाकर व्यापारी लोग किसानों की उपज का मूल्य गिराकर सस्ते में खरीद कर लेते है तथा किसानों की आवक बंद होने के बाद उच्चे भाव विक्रय करते है।
यह अफसोस का विषय है कि इस समय उड़द एवं तुवर के अलावा मूंग, मोठ और सोयाबीन की दाल भी भारी मात्रा में बाजार में आ रही है और फरवरी मार्च में चना, मटर की दाल भी बाजार में आयेगी। इस प्रकार देश में अगले चार पांच महिने तक दाल की उपलब्धता प्रचूर मात्रा में होने के बावजूद भारत सरकार के खाद्य एवं आपूर्ती मंत्रालय ने तुवर एवं उड़द की दाल का 4.50 लाख मेट्रिक टन आयात का कोटा जारी किया है यही नही सरकार ने तुवर के आयात के लिये यह शर्त भी रखी है कि तुवर के आयात का कोटा 20 नवम्बर तक काम में लेना होगा। सरकार का यह निर्णय मूल रूप से किसानों के दाल के उत्पादन का बाजार मूल्य गिराकर व्यापारियों को सस्ते में खरीदने का अवसर देने के लिये है। सरकार ने इस निर्णय से किसानों की गिरती आर्थिक स्थिति पर भारी वार किया है। दालों का आयात का समय और शर्तों को देखते हुये यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित है कि सम्बन्धित मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में व्यापारियों के संघ से सांठगांठ करके उन्हें लाभान्वित करने के लिये यह निर्णय लिया है। भारत सरकार के इस निर्णय से किसान वर्ग में बड़ा रोष एवं आक्रोश है।
अतः हमारा निवेदन है कि आप इस मामले में स्वयं हस्तक्षेप करे, दाले आयात के निर्णय को तत्काल वापिस ले तथा दालों की वर्तमान उपलब्धता एवं भविष्य में कमी होने पर ही दालों के आयात का निर्णय करें।
सादर। भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा
प्रतिलिपिः-
श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री, भारत सरकार, कृपया आप भी इस मामले में हस्तक्षेप करे।

(राजाराम मील)
अध्यक्ष

Date 10-10-2020

श्री अशोक जी गहलोत,
मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार,
जयपुर।

विषयः- चयनित अभ्यर्थियों की सूची रिक्तियों के तीन गुना तक बनाये जाने का परीक्षा नियमों में
संशोधन के सम्बन्ध।

महेादय,
राज्य सरकार ने हाल ही राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवाऐं परीक्षा नियमों में संशोधन करते हुये चयनित अभ्यर्थियों की सूची कुल अधिघोषित रिक्तियों की तीन गुना तक बनाये जाने का संशोधन किया है। लेकिन इस संशोधन से नियुक्तियों में आरक्षित वर्ग के साथ न्याय होगा और अनियमितता किये जाने की पूरी सम्भावना बढ़ जायेगी।
उदाहरण के लिय जहां 100 रिक्तियां है तब चयनित अभ्यर्थियों को जब नियुक्ति दी जायेगी वहां आरक्षित वर्ग के चयनित अभ्यर्थी वरीयता सूची के 200 क्रमांक तक और कुछ आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थी वरीयता सूची के क्रमांक 300 तक नियुक्ति पा जायेगे। परिणाम स्वरूप आरक्षित सूची को जब नियुक्तियों के लिये पुनः काम में लिया जायेगा तब आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी उपलब्ध ही नही होगे। इसी क्रम में जब आरक्षित सूची को नियुक्ति के लिये दूसरी या तीसरी बार उपयोग में लाया जायेगा तब 40 प्रतिशत अनारक्षित / सामान्य वर्ग में मेरीट के आधार पर आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी नियुक्ति नही पा पायेगा क्योंकि आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी द्वितीय या तृतीय नियुक्ति की सूची में सामान्य वर्ग में नियुक्ति के योग्य थे वे अभ्यर्थी तो प्रथम सूची में ही आरक्षित वर्ग में नियुक्ति पा चुके होते है। अतः जो संशोधन किया गया है उसमें उपरोक्त अनियमितताओं की सम्भावना को देखते हुये या तो संशोधन को वापिस लिया जाये अथवा विकल्प में अनियमितताओं की सम्भावना के निदान की समुचित व्यवस्था भी नियमों में की जानी चाहिये अर्थात आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी आरक्षित सूची के उपयोग में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय बार उपयोग में लाये जाने पर यथा स्थिति जो अभ्यर्थी मैरीट में सामान्य वर्ग में नियुक्ति पाये जाने योग्य है उन्हें सामान्य वर्ग में मैरीट के आधार पर नियुक्ति दी जानी चाहिये।
सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

Date: 26-09-2020

भारत सरकार ने कृषि जिन्स विपणन, आवश्यक वस्तु अधिनियम और कृषि भूमि को काॅरपोरेट को लीज पर दिये जाने के सम्बन्ध में पहले तीन आॅर्डीनेंश जारी किये थे तथा तत्पश्चात संसद से विधेयक के रूप में पास किये है। देश के किसान इन विधेयको के सम्बन्ध में उग्र प्रदर्शन कर रहे है।
सर्वप्रथम तो भारत सरकार ने इन आर्डिनेंश को जारी के सम्बन्ध में किसान संघो, किसानों के प्रतिनिधियों से कोई विचार विमर्श नही किया। वस्तुतः इस प्रकार के महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय संसद में बिल के रूप में प्रस्तुत कर समुचित विचार विमर्श के पश्चात ही निर्णय किया जाना चाहिये था। इन आर्डिनेंश को संसद में बिल के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन संसद में विचार विमर्श किये बिना ही और सांसदो का मत विभाजन किये बिना ही पास कर दिये। बिलों पर संसद में मत विभाजन नही होने से यह नही कहा जा सकता कि ये बिल बहुमत से पास किये गये है। सरकार की यह कार्यवाही किसानों के प्रति दमन और लोकतंत्र की हत्या के रूप में हुई है।
भारत सरकार औद्योगिक एवं उद्योगों से सम्बन्धित नीति, वाणिज्य व्यापार नीति, मल्टी ब्रांड में एफडीआई अनुमत करने, खुद्रा व्यापारियों के हितों इत्यादि के सम्बन्ध में निर्णय लेने से पहले उद्योग एवं वाणिज्य व्यापार के संघो/प्रतिनिधियों से व्यापाक विचार-विमर्श करने के पश्चात उनके सुझावों के अनुसार ही निर्णय लेती है लेकिन किसानों के मामलें में ऐसा नही करती बलिक किसानों की अनदेखी कर किसानों के हितों के खिलाफ आकस्मिक रूप से कृषि जिन्सों के आयात-निर्यात के महत्वपूर्ण निर्णय लेती रहती है जिससे किसानों को बड़ा भारी नुकसान होता है। भारत सरकार मूल्य नियंत्रण और मुद्रास्पिती को नियंत्रित करने के लिये कृषि उत्पादनों पर अन्धाधून्ध आक्रमण करके कृषि जिन्सों के भाव गिराने के लिये सतत प्रर्यत्न करती रहती है। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार मूल्य नियंत्रण एवं मुद्रास्पिती को नियंत्रित करने के लिये उपभोक्ता सामान यथा दवाइयां, चिकित्सा खर्च, उपभोक्ता सामान, इन्शोरेन्स इत्यादि को कभी भी प्रभावित नही करती। भारत सरकार ने कल ही आॅक्सीजन निर्माताओं की राय एवं सलाह के अनुसार आॅक्सीजन के दाम 47 प्रतिशत बढ़ा दिये जबकि काॅरोना में आॅक्सीजन के दाम घटाने चाहिये थे। सारार्श यह है कि सरकार किसानों का दमन कर उनको कमजोर करना चाहती है।
भारत सरकार कुछ जिन्सों की एमएसपी जारी करती है लेकिन गेहूं और धान के अलावा बाकि जिन्सों की खरीद किसानों द्वारा प्रत्येक सीजन में आंदोलन करने पर कुछ दिन के लिये कुल उत्पादन का 3-4 प्रतिशत ही क्रय करती है। सरकार का यह कृत्य किसानों के साथ एक खुला धोखा एवं आंखों में धोल झोकने जैसा है।
सरकार प्रमुख खाद्यान गेंहूं और चावल 80 करोड़ जनता को मुफ्त या 1-2 रूपये की कीमत पर उपलब्ध करा रही है। सरकार को गेंहूं और चावल मुफ्त वितरित करने के लिये इनकी खरीद करनी पड़ती है इसलिये सरकार इन जिन्सों का एमएसपी लागत से आधी कीमत का रखती है जिससे कि इन जिन्सों को मुफ्त वितरण में सरकार को कम आर्थिक भार वहन करना पड़े। इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार किसानों की कीमत पर नाममात्र या मुफ्त की कीमत पर अनाज वितरण कर रही है।
कृषि एवं किसान देश की अर्थव्यवस्था एवं देश की सीमाओं की सुरक्षा की रीढ़ है लेकिन बड़ा ही अफसोस एवं दुखद विषय है कि भारत सरकार कृषि एवं किसान को खत्म करने की नीति अपनाती जा रही है।
राजस्थान जाट महासभा का सुझाव है कि सरकार ने कृषि से सम्बन्धित विवादस्पद तीन विधेयक पास किये है उसके सम्बन्ध में किसानों की शकाये दूर करते हुये किसानों के हित में व्यापक संसोधन करने चाहिये।
हमारा यह भी सुझाव है कि सरकार को किसानों की उपज को एमएसपी पर खरीदने के सम्बन्ध में ‘‘किसानों की उपज को खरीद का अधिकार’’ सम्बन्धित कानून बनाना चाहिये तथा उसमें यह व्यवस्था होनी चाहिये थी कि किसानों की उपज को एमएसपी पर खरीद के लिये एक स्थाई व्यवस्था होगी तथा किसानों द्वारा एमएसपी पर बैचान के लिये प्रस्तावित समस्त उत्पादन क्रय किये जावेगे। भारत सरकार एमएसपी का निर्धारण स्वामी नाथन आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार करें और उन्हें लाभकारी मूल्य दे।
भारत सरकार कृषि जिन्सों की आयात-निर्यात का निर्णय किसान संघो एवं किसान प्रतिनिधियों के विचार-विमर्श के पश्चात ही करें।
राजस्थान जाट महासभा किसानों के इस संघर्ष में किसानों के साथ है तथा किसानों से अपील करती है कि वे सरकारों और जनप्रतिनिधियों पर व्यापाक दबाव बनाकर कृषि नीति का निर्णय किसान हित में करवाये।

राजाराम मील
मो0 9829010221

दिनांकः 19.09.2020

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर,
कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- भारत सरकार द्वारा कृषि उपज विपणन, आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा काॅरपोरेट को भूमि लीज पर दिये जाने सम्बन्धित आॅर्डिनेश/विधेयकों के सम्बन्ध में।
महोदय,
भारत सरकार के उपरोक्त तीनों आॅर्डिनेश/विधेयक/एक्ट के सम्बन्ध में किसानों को न तो कोई विशेष फायदा होने वाला है और न ही कोई विशेष नुकसान। इस सम्बन्ध में भारत सरकार और किसान संघ दोनों ही भ्रम एवं गलत फहमी की स्थिति में है।
अतः सारांश में हमारा सुझाव है कि भारत सरकार किसानों की शंका को दूर करने के लिये एमएसपी पर सुनिश्चित खरीद की एक स्थाई नीति की घोषणा करें।
दूसरे, भारत सरकार मूल्य संवर्धन नीति के तहत केवल कृषि उपज पर ही जबरदस्त आघात करती है। अफसोस का विषय यह है कि कृषि मंत्रालय तथा खाद्य एवं आपूर्ती मंत्रालय अलग-अलग विभाग है। कृषि मंत्रालय कृषि एवं किसानों के हित को देखता है जबकि खाद्य एवं आपूर्ती मंत्रालय केवल उपभोक्ताओं के हित को देखता है परिणाम यह होता है कि खाद्य एवं आपूर्ती मंत्रालय, कृषि मंत्रालय की सलाह एवं जानकारी के बिना ही कृषि जिन्सों की आयात-निर्यात के प्रतिबन्ध या अनुमति के आदेश जारी कर देता है जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है। उल्लेखनीय है कि भारत एवं राज्य सरकारे 80 प्रतिशत जनता को मुफ्त या नाममात्र की कीमत पर खाद्य अनाज उपलब्ध करा रही है। ऐसी स्थिति में खाद्य एवं आपूर्ती मंत्रालय कृषि जिन्सों की आयात-निर्यात नीति तय करता है उसका फायदा केवल मात्र मध्यम एवं उच्च वर्ग को ही होता है।
अतः सुझाव यह है कि कृषि तथा खाद्य एवं अपूर्ती मंत्रालय का एक ही विभाग एक ही मंत्री के अधीन होना चाहिये, जिससे कि कृषि जिन्सों की आयात-निर्यात नीति में किसानों एवं उपभोक्ताओं के हित को संतुलन एवं समन्वय हो सके। इस सम्बन्ध में सुझाव यह भी है कि भारत सरकार कृषि आयात एवं कृषि उत्पादकों के आयात एवं निर्यात की नीति किसानों के हित में तय कर स्थाई रूप से जारी करें। इससे किसानों की आमदनी कुछ हद तक बढेगी तथा किसानों का सरकार प्रति आक्रोश भी कम होगा।
कृषि उत्पादन और तत्सम्बन्धी आयात-निर्यात नीति के सम्बन्ध में हमने पूर्व में भी सुझाव भिजवाये है लेकिन अफसोस है कि आपके विभाग ने हमारे पत्रों की अभिस्वीकृति एवं विभाग द्वारा लिये गये निर्णय से अवगत नही कराया।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

27.07.2019
श्री नीतिन गडकरी,
भूतल परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड राष्ट्रीय राजमार्ग अमृतसर से जामनगर एवं सरस्वती नदी के पुनरोधार के
सम्बन्ध में।
महोदय,
हमें यह कहते हुये हर्ष हो रहा है कि सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग इन्फ्रास्टेक्चर में आप सराहनीय कार्य कर रहे है और इसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। चुनोतीपूर्ण परियोजनाओं की परिकल्पना एवं लागू करना आपका शौक है। इसी परिपेक्ष्य में हम आपको एक चुनोतीपूर्ण एवं अभिनव सुझाव देना चाहते है जो इस प्रकार हैः-
1. अब यह तथ्य प्रमाणित हो गया है कि विलुप्त सरस्वती नदी यमूना नदी से किसी स्थान से निकलकर हरियाणा के सिरसा, राजस्थान के हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर, बाडमेर, जालौर जिलों से होती हुई कच्छ की खाड़ी में समाहित होती थी। आपके विभाग द्वारा अमृतसर से जामनगर ग्रीन फिल्ड हाईवे बनाया जा रहा है। सरस्वती नदी के बहाव और प्रस्तावित अमृतसर जामनगर ग्रीन फिल्ड हाईवे का एलाईन्मेंट करीब-करीब सामान या कुछ दूरी के अन्तर पर ही रहा है। इसी एलाईन्मेंट पर शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात प्रस्तावित नदियों को जोड़ने का लिंक परियोजना का राजस्थान गुजरात ़क्षेत्र का एलाईन्मेंट है। अतः हमारा सुझाव है कि इस प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड हाईवे का निर्माण राजस्थान एवं गुजरात में इस प्रकार किया जाये कि हाईवे के साथ-साथ सरस्वती नदी का बहाव चैनल भी बना दिया जावे और सरस्वती नदी के इस बहाव चैनल को ही राजस्थान गुजरात नदियों को जोड़ने का लिंक के रूप में काम में लिया जाये। क्योंकि इस एलाईन्मेंट पर सरस्वती नदी का बहाव गुरूत्वाकर्षण के आधार पर होगा, इसलिये हाईवे के निर्माण के लिये जो मिट्टी उठाई जायेगी उसी से सरस्वती नदी का बहाव क्षेत्र बन जायेगा। पश्चिमी राजस्थान की टोपोग्राफी इस प्रकार है कि हिमालय की नदियों के माध्यम से मानसून में अतिरिक्त जल फल्ड के रूप में बहता है उसको राजस्थान के मरूस्थल में संचयन किया जा सकता है क्योंकि पश्चिमी राजस्थान में हजारों की संख्या में डिप्रेसनस (नीचा भूतल) है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी राजस्थान में सरस्वती नदी/शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात लिंक के द्वारा राजस्थान के मरूस्थल में मानसूनकाल में सिंचाई के लिये दो पानी भी उपलब्ध करा दिया जाये तो देश तिलहन और दलहन की पूर्ति राजस्थान कर सकता है। सरस्वती नदी के पुर्नजीवन और शारदा-यमुना-गुजरात लिंक से राजस्थान का मरूस्थल पुनः हरीत क्षेत्र में बदल जायेगा, रोजगार का अपार सर्जन होगा, पशुधन में अप्रत्याशित वृद्धि होगी तथा देश की जीडीपी में भी सार रूप से वृद्धि होगी।
कृपया उपरोक्त सुझाव पर आप विचार करे और इसकी फिजीबिलिटी का परीक्षण करवाये।
आशा है उपरोक्त सुझाव उपयोगी पाये जावेगा।
सादर।
भवदीय

(महेन्द्र सिंह)                                  (राजाराम मील)
महासचिव संगठन                              अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा                  राजस्थान जाट महासभा

25.7.2019

श्री अशोक गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- विश्वविद्यालयों में आरक्षण के सम्बन्ध में

महोदय,
मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालय, काॅलेजों में आरक्षण के लिये विश्वविद्यालय एवं काॅलेज को एक यूनिट माने जाने का आर्डिनेश 2019/आदेश दिया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उक्त आदेशों के प्रति केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, भारत सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से सहायता प्राप्त करने वाले विश्वविद्यालय और डीम्ड विश्वविद्यालयों को भिजवाई गई है। भारत सरकार के उक्त आॅडिनेश एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों की तरह राज्य सरकार की तरफ से भी विश्वविद्यालय एवं काॅलेजों को आरक्षण के उद्देश्य से एक यूनिट माने जाने का आदेश जारी किया जावे जिससे कि राजस्थान सरकार के अधीन विश्वविद्यालय एवं काॅलेज भी तदनुसार आरक्षण दे। उल्लेखनीय है कि राजस्थान मेडीकल ऐजूकेशन सोसाईटी ने प्रोफसर, एसोसियट प्रोफसर, असिस्टेड प्रोफेसर एवं डेमोस्ट्रेस्टर्स की भर्ती की विज्ञप्ति जारी की गई है उसमें विश्वविद्यालय/काॅलेज को एक यूनिट नही माना गया है। यूजीसी के आदेश की प्रति संलग्न है। इस सम्बन्ध में डाॅ0 प्रियंका कुमारी माडिया का प्रार्थना भी आवश्यक कार्यवाही के लिये संलग्न है।
सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

24.7.2019

श्री अशोक जी गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा विभिन्न सेवाओं के लिये अभ्यर्थियों का चयन के परिणाम में
पारदर्शिता पर प्रतिबन्ध के सम्बन्ध में।

महोदय,
शासन प्रशासन में निष्पक्षता बनाये रखने, अनियमितता एवं भ्रष्टाचार पर अंकुश तथा तत्सम्बन्धी विषयों पर जनता को सुगमता से जानकारी का अधिकार एवं शासन व्यवस्था सूचारू रहे, गणतंत्र शासन व्यवस्था के ये महत्वपूर्ण एवं अहम कारक है।
इसी परिपेक्ष्य में सोनिया गांधी जी और यूपीए की सलाह परिषद की अनुशंषा पर यूपीए सरकार ने आरटीआई अधिनियम 2005 बनाकर लागू किया था, जिसका देश-विदेश में बड़ी प्रशंसा हुई थी। हाॅल ही भारत सरकार आरटीआई अधिनियम में संशोधन कर इसको डायलूट कर रही है जिसका कांग्रेस सहित सभी विरोधी दल संसद में बड़ा विरोध कर रहे है।
लेकिन आश्चर्यजनक एवं दुखद बात है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग आरटीआई अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत लोक सेवाओं में अभ्यर्थियों के चयन में अन्तिम परिणाम में भी गोपनीय रखती है। आयोग की चयन प्रक्रिया में गोपनियता की बात तो समझ में आती है लेकिन चयन का अन्तिम परिणाम जारी होने के पश्चात परिणाम में गोपनियता रखना विश्मय का विषय है। इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिये यह कहना होगा कि आरपीएससी में अभ्यर्थियों के चयन का अन्तिम परिणाम सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही किया जाता बल्कि गोपनीय रखा जाता है तथा कोई भी अभ्यर्थी केवल अपना ही परिणाम देख सकता है, सेवा के दूसरे अभ्यर्थियों का परिणाम (प्राप्तांक वगैरह) नही देख सकता।
महोदय, आरपीएससी द्वारा यह सब कुछ सेवाओं के चयन में अनियमितता, भ्रष्टाचार, भाई-भतिजावाद, आरक्षण को विकृत करना आदि को छुपाने और उस पर पर्दा डालने के लिये किया जाता है। भाजपा के गत पांच साल के शासन में आरपीएससी द्वारा परिणाम में गोपनियता की इस प्रक्रिया को लागू किया गया है।
आश्चर्य का विषय यह भी है कि लगातार सरकार से निवेदन करने के उपरान्त भी सरकार इस विषय पर मौन है जिसकी वजह से जनता में यह एक मिथक फैल रहा है कि आरपीएससी की अनियमितता, भ्रष्टाचार, भाई-भतिजावाद को बनाये रखने में सरकार की भी सह है।
अतः हमारा निवेदन है कि राजस्थान सरकार इस विषय का संज्ञान ले और आरपीएससी को निर्देश दे कि वे सेवाओं के अन्तिम परिणाम में पारदर्शिता बनाये।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

19.07.2019

श्री अशोक जी गहलोत,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- राजस्थान सरकार की भर्तियों में आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड एवं अन्य भर्ती
प्राधिकारियों द्वारा आरक्षण में धांधली के सम्बन्ध में।

महोदय,
कृपया राजस्थान लोक आयोग द्वारा पंचायती राज विभाग के सहायक अभियंताओं की चयन के परिणाम का अवलोकन करे जो संलग्न पत्र में परिदर्शित है। आयोग ने सहायक अभियंता सिविल के पदों में सामान्य श्रेणी की कट-आॅफ 102.78, एससी के अभ्यर्थियों की कट आॅफ 49.31 एसटी के अभ्यर्थियों की कटआॅफ 131.94 और ओबीसी की कटआॅफ 112.50 रखी है। कई आरक्षित श्रेणियों में सभी महिलाओं को चयनित कर लिया है तथा कुछ आरक्षित श्रेणियों में अभ्यर्थी उपलब्ध ही नही बताये है। स्थिति यह है कि राज्य सरकार और आरपीएससी की नीति के कारण चयन में एससी, एसटी, ओबीसी की बजाय सामान्य श्रेणी को आरक्षण दिया जा रहा है जैसा कि परिलक्षित है एसटी के अभ्यर्थियों का कटआॅफ 131.94 रखा है जबकि अनारक्षित सामान्य श्रेणी का कटआॅफ 102.78 रखा है। सहायक अभियंता सिविल, सहायक अभियंता यांत्रिकी/विद्युत एवं सहायक अभियंता पंचायती राज के परिणाम की स्थिति भी ऐसी ही है जिसमें आरक्षित वर्ग ओबीसी की कटआॅफ काफी अधिक है जबकि अनारक्षित वर्ग की कटआॅफ कम है। एक सामान्य ज्ञान की बात है कि अनारक्षित सामान्य श्रेणी में मैरिट के आधार पर सभी श्रेणियों के अभ्यर्थी आयेगे और सामान्य श्रेणी की आखिरी कटआॅफ के पश्चात आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को चयनित घोषित किया जायेगा। लेकिन आरपीएससी इससे उल्टी प्रक्रिया अपना रहा है। राज्य सरकार की आरक्षण नीति को असफल करने के लिये आरपीएससी सबसे पहले प्रारम्भिक परीक्षा में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके आरक्षित कोटे की संख्या तक ही सफल घोषित करती है उसके पश्चात साक्षात्कार के लिये पुनः आरक्षित अभ्यर्थियों को सीमित कर देता है। परिणाम स्वरूप आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी अन्तिम परीक्षा में बहुत कम रह जाते है और उनकी मैरीट सामान्य अभ्यर्थियों से उपर चली जाती है।
महोदय, यह सब-कुछ अनारक्षित वर्ग ने एक षड़यंत्र के तहत व्यवस्था बना रखी है जिसके परिणाम स्वरूप राजस्थान में आरक्षण आरक्षित वर्ग को नही मिल रहा है बल्कि अनारक्षित वर्ग को लगभग 75 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।
अंधेरगर्दी, अन्याय, नीति का दुरूपयोग और अव्यस्था का इससे बड़ा और उदाहरण नही मिल सकता। हम गत पांच छः साल से इस अव्यवस्था को सुधारने के लिये निरन्तर राज्य सरकार से निवेदन कर रहे है लेकिन आरक्षण विरोधी लोबी हमारे प्रयासों को निराशा और असफलता में बदल रही है।
अतः हमारा निवेदन है कि आप इस मामले को व्यक्तिशः देखे और आरक्षण सम्बन्धित कानून और नियमों में बदलाव कर आरक्षित वर्ग के लिये न्याय की स्थिति बनाये।
सादर। भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष, राजस्थान जाट महासभा

Date 08-06-2019

श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत,
मंत्री, जल शक्ति,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

महोदय,
भारत सरकार में जल शक्ति विभाग का केबीनेट मंत्री बनाये जाने पर बहुत-बहुत बधाई!

‘‘जल ही जीवन है’’ तथा हमारे देश के अधिकांश भागों में सिंचाई का तो कहना ही क्या, पेयजल का ही अभाव है। जल के अभाव में देश में त्राहि-त्राहि मचि हुई है, देश की 55 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि सिंचाई के लिये तरस रही है तथा भूजल समाप्त होने को है। इस दृष्टि से आपका विभाग और उŸार दायित्व बहुत ही महत्वपूर्ण है।
आपको जानकारी होगी कि राजस्थान की पेयजल एवं सिंचाई से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण योजनाऐं, अनुमोदन और प्रारम्भ किये जाने के इन्तजार में है। ऐसी कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं का जिक्र करना उचित समझेगे जो निम्नानुसार हैः-
1. पूर्वी राजस्थान नहर
2. सीकर-झुझुनूं-चूरू की पेयजल एवं सिंचाई की योजना
3. ब्राहीमिनी नदी को बिसलपुर से जोड़ना
4. इशरदा बांध का निर्माण
5. नदियों को जोड़ने की योजना के तहत शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात लिंक परियोजना
6. सिन्धू जल सन्धि के तहत भारत के हिस्से का जल जो पाकिस्तान में जा रहा है उसको राजस्थान को आवंटित कर राजस्थान में लाये जाने के सम्बन्ध में
7. सरस्वती नदी को पुर्नजीवित करना

महोदय, राजस्थान के निवासी अगले पंाच साल में उपरोक्त योजनाऐं पूरी होने की आंकाशा/अपेक्षा रखते है। इन योजनाओं का काम पूर्ण होने पर राजस्थान की 75 प्रतिशत पेयजल की समस्या तथा एक विस्तृत क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो जायेगी।
शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात लिंक परियोजना से राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाडमेर और जौधपुर जिले के शेरगढ़ तहसील की 7 लाख हैक्टर भूमि में सिंचाई का प्रावधान है। इस परियोजना को आप और विस्तृत बनाकर तथा अतिरिक्त पानी आवंटित कर नागौर और जोधपुर जिले के अधिकांश भाग में सिंचाई सुविधा सृजित कर सकते हो। लेकिन इस योजना को लागू करने के लिये भारत और नेपाल के मध्य जल बंटवारे की संधी होना आवश्यक है क्योंकि पानी का संचयन नेपाल क्षेत्र में ही किया जा सकता है।
सीकर, चूरू, झुझुनूं की परियोजना को भी प्राथमिकता से लागू करना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि इस क्षेत्र में सिंचाई के 2 लाख कुऐं है जिन पर करीब 6 हजार करोड़ रूपये का निवेश है, इनसे 10 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है, लगभग 20 लाख टन अनाज पैदा हो रहा तथा भारी मात्रा में पशु पालन एवं दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। इस क्षेत्र का भूजल अगले 10 साल में खत्म हो जाना है जिसके कारण निवेश उत्पादन, रोजगार तो समाप्त हो ही जायेगा बल्कि पेयजल की भी बड़ी भारी किल्लत हो जायेगी।
आशा है आप राजस्थान की इन परियोजनाओं को प्राथमिकता पर अनुमोदित कर भारत सरकार की ओर से समुचित बजट सहायता का प्रावधान भी करावायेगे। अपेक्षा तो यह भी है कि राजस्थान की जल की स्थिति को क्रिटिकल मानते हुये इन योजनाओं को भारत सरकार के अधीन और भारत सरकार के बजट से लागू करवायेगे।
शुभकामनाओं सहित।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

Date 10-5-2018

श्रीमती वसुन्धरा राजे जी,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- महाराजा सूरजमल का स्मारक बनाने एवं सड़क का नामकरण करने के सम्बन्ध में।

महोदया,
18वीं सदी में सूरजमल ने देश में मुगलों के शासन को सीमित करते हुये राजस्थान के भरतपुर, अलवर, वर्तमान हरियाणा का अधिकांश भू-भाग और पश्चिम उत्तर प्रदेश के बड़े भू-भाग को मुगलों से छीनकर भरतपुर हिन्दू राज्य की स्थापना की थी। वे अजय यौद्धा तो थे ही, साथ ही उन्होंने एक कल्याणकारी सम्राज्य की स्थापना भी की तथा हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में भी उन्होंने अपनी शक्ति एवं पराक्रम का उपयोग किया था। वे अपने समय के प्रतापी राजा थे।
तत्कालीन जयपुर राज्य में महाराजा जय सिंह के उŸाराधिकार का विवाद हुआ तो महाराजा सूरजमल अपनी सेना सहित भरतपुर से वर्तमान मालवीय नगर, गोपालपुरा होते हुये बगरू गये थे तथा बगरू की लड़ाई में तत्कालिन राजपुताने के समस्त राजा-महाराजा सामन्तों के संयुक्त सेना को हराकर ईश्वर सिंह को जयपुर की राजगदी का उŸाराधिकारी बनवाया था।
यह अफसोस का विषय है कि इतिहासकारों ने और राज्य सरकार ने ऐसे देश भक्त, यौद्धा, हिन्दू धर्म के रक्षक अपराजित यौद्धा महाराजा के शोर्य को इतिहास में उचित स्थान नही दिया।
अतः महाराजा सूरजमल की स्मृति को पुनस्थापित करने एवं चिर स्थाई बनाने के लिये मालवीय नगर के एमएनआईटी चैराहे पर महाराजा सूरजमल की प्रतिमा स्थापित की जाये और उनके आने-जाने के मार्ग पर वर्तमान में अवस्थित सड़क- जेएलएन मार्ग के एमएनआईटी चैराहे से अजमेर रोड़ प्लाईआॅवर के मध्य की सड़क (एमएनआईटी चैराहे से भास्कर कार्यालय के सामने से गोपालपुरा चैराहा, रिद्धी-सिद्धी चैराहा, गुर्जर की थड़ी, किसान धर्मकांटा, गजसिंहपुरा, कमला नेहरूनगर पुलिया होते) का नामकरण ‘‘महाराजा सूरजमल मार्ग’’ किया जाये।
सादर।

प्रतिलिपिः- श्री अशोक लाहोटी, महापौर, जयपुर नगर निगम को प्रेषित कर निवेद नहै कि कृपया उपरोक्तानुसार महाराजा सूरजमल
के नामकरण कर उनकी स्मृति को चिरस्थाई बनाया जाये।

भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

dated 2-7-2018

श्री पियुष गोयल,
वित मंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- किसानों पर आर्थिक अत्याचार बंद करने एवं दवाइयों तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमते नियंत्रित करने के सम्बन्ध में।

महोदय,
हाल ही एक दवा निर्माता कम्पनी ने खुलासा किया कि वे उनके द्वारा निर्मित दवा पर 18 प्रतिशत जीएसटी एवं 20 प्रतिशत मुनाफा लेकर 9 रूपये में डीस्टीब्यूटर को देते है जो उसी 9 रूपये की दवा को 120 रूपये में बेचता है। होलशेलर और रिटेलर विक्रेता का मुनाफा अतिरिक्त होता है।
गत सप्ताह जयपुर के सवाईमानसिंह अस्पताल एवं नव निर्मित ट्रोमा सेन्टर को जोड़ने वाली सड़क के नीचे बनाई गई टनल में 15 स्क्वायर मीटर की एक दवाई के प्रयोजन की दूकान 5 करोड़ 19 लाख में विक्रय हुई है। वही पर अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित दूकान 4 करोड़ 41 लाख रूपये में निलाम हुई है। आप अन्दाजा लगा सकते है कि दवाइयों के व्यापार में कितना मुनाफा है। ईलाज एवं विभिन्न प्रकार की जांचों का खर्चा भी इतना अधिक है कि गम्भीर बिमारी का व्यक्ति कम से कम 4-5 लाख रूपये खर्चें के बिना अस्पताल से बाहर नही आ पाता।
सरकार मंहगाई बढ़ने और कीमतों को रोकने के लिये भरषक प्रयत्न करती है लेकिन सरकार की इस नीति के हथोड़े की मार किसानों पर ही होती है। सरकार महगाई रोकने एवं कीमते गिराने के लिये केवल मात्र कृषि उत्पादनों पर ही अटैक करती है तथा इसके लिये खाद्यानों का अनावश्यक आयात करना तथा अनावश्यक रूप से निर्यात पर रोक लगाना सरकार की सामान्य नीति का भाग है। जबकि सरकार को यह जानकारी है कि किसान को उसके प्रत्येक कृषि उत्पादन में मुनाफे की बजाय घाटा होता है।
खाद्यानों पर एक परिवार का वर्षभर का खर्चा 10-15 हजार रूपये होता है। सरकार 67 प्रतिशत जनता को तो मामूली कीमत पर पीडीएस का अनाज उपलब्ध कराती है इसलिये 67 प्रतिशत जनता बाजार से खाद्यान क्रय नही करती। इससे स्पष्ट है कि सरकार मध्यम एवं उच्च वर्ग के हित के लिये खाद्यानों की कीमत गिराने एवं नियंत्रित रखने क लिये भरषक प्रयत्न करती है। सरकार का यह कृत्य देश के किसानों पर एक घ्रर्णित एवं क्रूर अत्याचार है।
देखने की बात यह है कि सरकार मंहगाई को प्रभावित करने वाली दवाइयां, स्वास्थ्य सम्बन्धी जांचे, निजी अस्पतालों में ईलाज का खर्चा तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं का मूल्य नियंत्रित क्यों नही करती। सरकार की नीति है कि हर व्यक्ति को आवास उपलब्ध हो और सरकार इसके लिये बहुत बड़ा बजट? प्रावधान भी करती रहती है लेकिन सीमेन्ट की कीमत पर कभी नियंत्रण नही करती और राजस्थान सरकार ने तो अपनी कुनीति से अचानक बजरी की कीमत 12 रूपये प्रति घनफूट से बढ़ाकर 50 रूपये प्रति घनफूट कर दी जिससे राजस्थान में सभी निर्माण कार्य ठप हो गये तथा लाखों मजदूर बैरोजगार हो गये।
अतः हमारा निवेदन है कि सरकार मंहगाई रोकने, जनता को सस्ते खाद्यान उपलब्ध कराने के नाम पर खाद्यानों की कीमते कृत्रिम रूप से गिराकर एवं कम रखकर जो किसानों पर अत्याचार कर रही है उसे बंद करे तथा दवाईयां, निजी अस्पताल में ईलाज का खर्च एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की नीति अपनाऐं।
भवदीय

(महेन्द्र सिंह)
महासचिव संगठन
राजस्थान जाट महासभा

01-05-2018

 प्रधान मंत्री जी 

भारत सरकार 

 नई दिल्ली 

            वियष :- किसानों की समस्याएँ और हालत सुधार के सम्बन्ध मे

महोदय,

       देश के किसानों की समस्याओं के हल एवम हालत सुधारने के सम्बन्ध मे सरकार शायद चिन्तित एवम प्रयत्नशील होगी लेकिन इसके लिए सरकार को आधारभूत नीतिगत परिवर्तन करना होगा। सर्व प्रथम, सरकार इस सम्बन्ध मे अधिकारियों और नीति आयोग पर भरोसा करती है तथा उन्हें नीतिगत निर्णय या सुझाव प्रस्तुत करने के निर्देश देती है लेकिन अधिकारी ज़मीनी हक़ीक़त नहीं समझते इसलिए नीति आयोग या अधिकारियों के प्रस्ताओं पर कोइ बदलाव या सुधार की संभावना नहीं है।

              यहाँ हम कुछ सुझाव प्रस्तुत करना चाहेंगे !

  1. सरकार क़ीमत स्थिरीकरण, मंहगाई रोकने या घटाने का प्रयत्न सतत करती रहती है। इस प्रक्रिया मे सरकारकेवल मात्र कृषि उत्पादनों की क़ीमत घटाने, तथा इसके द्वारा मंहगाई  रोकने के  उपाय करती है और अन्य उपभोक्ता सामान की क़ीमत घटाने, स्थिरीकरण, या बढ़ने से रोकने के कोई प्रयत्न नहीं किये जाते। इसके लिए सरकार विदेशों से खाद्यान्न, तेल, तिलहन, दलहन का आयात करती है, निर्यात पर प्रतिबंध लगाती, निर्यात तब खोलती है जब खाद्यान्न व्यापारियों के स्टाक मे आ जाता है और इस प्रकार कात्यायन का बाज़ार गिराती है।  ऐसा क्यों, मूल्य संवृद्धि रोकने की मार किसानो पर ही क्यों? और विशेषकर उस स्थिति मे  जबकि किसान को उसकी उपज का लागत मूल्य ही नहीं मिलता। दूसरे जब सरकार 65% जनता को एक दो रूपये मे मे खाद्यान्न उपलब्ध करा रही है तो फिर मध्यम और उच्च वर्ग के लिए खाद्यान्न के भाव गिरा कर किसानो के पेट पर लात क्यों मारती है?
  2. सरकार 65% जनता को एक रूपये दो रूपये गैंहु चावल उपलब्ध करा रही है यह रेट पन्द्रह वर्ष पूर्व तय हुई थी जिसे प्रत्येक तीसरे वर्ष बढ़ाना था लेकिन पन्द्रह वर्ष से पीडीएस खाद्यान्न की रेट नहीं बढ़ाई जिसकी वजह से पन्द्रह वर्ष से गैहुं व मोटे अनाज के भाव स्थिर हैं और एमएसपी भी नाममात्र की बढ़ रही है। कहने का अर्थ यह है कि मुफ़्त अनाज  योजना का भार किसान वहन कर रहे हैं।
  3. किसान फ़सल बीमा योजना का लाभ केवल बीमा कम्पनिया उठा रही हैं।
  4. कृषि औज़ार ट्रेक्टर, खाद बीज के भावों पर नियन्त्रण के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही बल्कि किसान की लूट के लिए इनके निर्माता व्यापारियों को खुली छूट दे रखी है।
  5. प्रमुख उत्पादन यथा गैंहु ,चावल , मोटा अनाज की एमएसपी नाममात्र की बढ़ाई जाती है।
  6. एमएसपी पर ख़रीद की न कोई व्यवस्था है और न ही ख़रीद होती है। केवल गैहुं चावल की मामुली ख़रीद होती है।
  7. खाद्बायान बाज़ार को को किसान हितेषी बनाये जाने के कोई प्रयत्नों नहीं हो रहे।
  8. हर खेत को सिंचाई का पानी तथा सिंचाई परियोजनाओं को लागू करना सरकार की प्राथमिकता मे नहीं है।

                   अत: इस हालात से उबरने के लिए हम निम्न सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं:-

  1 स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू की जावे।

   2 कृषि फसल बीमा योजना सरकारी बीमा कम्पनी के माध्यम से ही लागू की जावे तथा इसकी सलाहकार परिषद मे किसान आयोग तथा किसानो के प्रतिनिधियों को रखा जावे।

     3 एमएसपी पर ख़रीद की स्थायी आधारभूत ढाँचागत व्यवस्था की जावे।

     4 मूल्य / मंहगाई  संवर्धन नियन्त्रण नीति से खाद्यान को बाहर रखा जावे।

     5 खाद्यान आयात निर्यात नीति किसानों के हितो मे तय हो।

     6 कृषि नीति निर्धारण मे किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श किया जावे।

     7 खाद्एयान एमएसपी से कम  भाव पर ख़रीद को क़ानूनन प्रतिबंधित किया जावे।

     8 कृषि औज़ार, खाद बीज के मूल्यों पर नियन्त्रण किया जावे।

     9 सरकारी सहकारी क्षेत्र मे खाद का उत्पादन बढ़ाया जावे।

     10 किसान पेन्शन योजना लागू की जावे।

              आशा है उपरोक्त सुझाव उपयोगी सिद्ध होगें।

भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

29-3-2018

 Shri Sri Ram Vedere,

Dear Sir ,

We the Rajasthan Jat Mahasabha  are giving suggestions to GOI & GOR for the last ten years regarding water harvesting and management in the state and the country .

In this context, we are very much  influenced by your efforts for the the water conservation, harvesting and management in Rajasthan  and rather your positive approach has encouraged us further more in our efforts.

Furthermore ,in this context, we we have some suggestions to submit. Rather we are resubmitting the suggestions which we have submitted to the various authorities from time to time ,which are as under :—

  1. If the rain waters of River Chambal and its tributaries is harvested in Rajasthan or is diverted to the arid areas of Rajasthan , flood  problem caused by The River Ganga in Eastern UP, Bihar and Bengal can be solved to the extent of 80 % . In view of this, the proposed Eastern Rajasthan Canal should be approved by GOI and implemented on priority and also should be implemented as a National Project .
  2. The Extinct River Saraswati should be revived and it may be revived in the form of “Sharada- Yamuna-Rajasthan -Gujarat River linkage project “and for that purpose  availability of land at least in Rajasthan and Gujarat should not be constraint since land in the Saraswati course is arid and holdings are also large.
  3. Eastern Rajasthan canal project should basically  cover lands of districts of Tonk, Ajmer and Jaipur which are comparatively more arid and have less Mansoon rain and shorter duration of Mansoon comparatively Kota region.
  4. Irrigation coverage of Existing Chambal project area shall be a wastage of resources because existing available water in the Chambal Canal can cover additional areas by  by introducing sprinkle irrigation
  5. The,capacity  of talabs bundhs ,lakes , proposed to be filled by the proposed project should be expanded and enlarged by dradging and deepening.
  6. All the village johar, talabs and water harvesting structures in every field of tonk district should be provided water from Eastern Rajasthan Canal.

We hope you shall find these proposals to be useful and worth implementing !
Sincerely

 (Raja Ram Meel)

President

Rajasthan Jat Mahasabha

22-01-2018

श्री अर्जुन जी मेघवाल,

मंत्री, जल संसाधन विभाग,

भारत सरकार, नई दिल्ली

महोदय,

       आप जानते ही हैं कि जल अभाव आपके क्षेत्र सहित उतरी, पश्चमी तथा उतरीपूर्वी राजस्थान की सबसे बड़ी समस्या है। सीकर झुंझुनू मे तो अगले दस वर्ष मे भूजल समाप्त हो जाने पर डेड लाख कुओं पर निवेश, रोज़गार, उत्पादन तथा पशुधन समाप्त हो जाना है और खेतों मे बसे लोगों को पेय जल के भी लाले पड़ जावेगे। इसी स्थिति  मे इस अभावग्रस्त क्षेत्र के सांसदों का प्रथम  दायित्व बनता है कि वे साँझा प्रयत्न कर इस समस्या का स्थायी निराकरण करे।

       देश मे दीर्घ अवधि के पश्चात नदियो को जोड़ने की योजना को लागू करने का निर्णय लिया गया है। सोभाग्य से गत दिनों जल संसाधन मंत्रालय की ज़िम्मेवारी श्री गड़करी जी, श्री मेघवाल जी एवं सत्यपाल जी को मिली है जो बड़े ही डायनेमिक तथा परिणाम देने वाले मंत्री है।

       नदियो को जोड़ने की योजना के अन्तर्गत शारदा-यमुना-राजस्थान – गुजरात परियोजना है जिसके वर्तमान योजना स्वरूप के अनुसार पन्द्रह लाख हेक्टर मे सिंचाई का प्रावधान है तथा राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाडमेर और जालोर जिलो मे सिंचाई का प्रावधान है। इसी परिपेक्ष्य मे हमारा सुझाव है कि इस योजना मे एक आधी ओर नदी का जल जुडवाकर इस  योजना को वृहद बनवाये तथा इसको प्राथमिकता से लागू भी करवाये। क्योंकि इस परियोजना की डीपीआर तैयार हो रही है अत: यह उचित अवसर है।

       यदि इस समय इस योजना को नहीं संभाला गया तो भविष्य मे यह क्षेत्र जल अभावग्रस्त ही बना रहेगा।

                           शुभकामनाऔ सहित ।

भवदीय

(राजाराम मील)

अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

date 20-1-2018

श्री नितिन गड़करी

मंत्री जल संसाधन

भारत सरकार नई दिल्ली

महोदय,

            यह बड़े ही संतोष की बात है कि आप रोड सेक्टर  के बाद अब जल संसाधन सेक्टर मे भी बेहतरीन  कार्य कर रहे है। इससे पूर्व जल संसाधन मंत्रालय मे ऊमा भारती ने तीन वर्ष ख़राब किये। इस मंत्रालय मे आपके आने से एक आशा बनी है।

            आपने नदियो को जोड़ने की गत बैठक मे राज्य सरकारो से योजनाओं की सहमति पर वार्ता करने का निर्णय लिया। राज्यों से वार्ता कर लेनी चाहिये लेकिन आप जानते ही हैं कि अधिकांश राज्य जल मे दूसरे राज्यों को हिस्सा नहीं देना चाहते बल्कि या तो विरोध करेंगे या विषय को टालते रहेंगे। पंजाब सरकार का जवलन्त  उदाहरण है जो दूसरे राज्यों के हिस्से के जल को तो रोकते ही हैं बल्कि अतिरिक्त उपलब्ध  जल पाकिस्तान की ओर प्रवाहित कर देता है लेकिन राजस्थान को नही देता।

            इस पेरिपेक्ष्य मे हमारा सुझाव है कि यद्पि जल एवं सिंचाई राज्यों का विषय है  लेकिन संविधान की सातवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रथम  सूची -संघीय  सूची की प्रवृष्टि संख्या 56 मे प्रावधान है कि संसद कानून बनाकर अन्तरराज्यिय नदियो के जल की सिंचाई योजनाएँ लागू कर सकता है। अत: हमारा सुझाव है रीवर इन्टरलिंकिक योजना संसद से अनुमोदित करा कर लागू की जावे जिससे विलम्ब नहीं हो तथा भविष्य के विवादों की गुंजायश भी नही रहे। राज्य सरकारों से फिर बात करते रहें ।

साभार

भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

date 10-1-2018

प्रधानमंत्री जी,

भारत सरकार,

नई दिल्ली

महोदय,

                हमारे लिए यह प्रसन्नता की बात है कि  आप अगले दिनों राजस्थान के बाड़मेर और झुंझुनू मे पधार रहे है। राजस्थान मे आपका  स्वागत है। इस अवसर पर हम एक दो तथ्य आपके ध्यान मे लाना चाहेंगे।

                प्रथम, आपने लोक सभा चुनाव पूर्व जोधपुर की सभा मे कहा था कि “हम सत्ता मे आयेंगे तो प्रत्येक खेत को सिंचाई का पानी देंगे।” लेकिन पिछले साढ़े तीन वर्ष मे भारत सरकार ने राजस्थान की एक बीघा भूमि मे भी सिंचाई का विस्तार नहीं किया है। शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात लिंक की कोई सुध नहीं ली जा रही। कडाणा बॉध का जल १९६६ के समझोते के तहत राजस्थान को मिलना था जिसमें गुजरात सरकार  की वादा ख़िलाफ़ है। राजस्थान मद्य प्रदेश के बीच पार्वती  और काली सिंध के जल उपयोग पर समझोता नही हो रहा तथा यमुना का जल झुंझुनू लाने की योजना पर भी कोई कार्यवाही नहीं हो रही। कश्मीर की नदियो का भारत के हिस्से का जल देश के एक नम्बर दुश्मन पाकिस्तान  को ख़ैरात मे दिया जा रहा है जबकि उक्त जल का आधा हिस्सा राजस्थान  के रेगिस्तान मे आना चाहिये।

                 दूसरे, राजस्थान ने गत लोकसभा चुनाव मे बीजेपी को २५ मे से २५ सीटें दी तथा विधान सभा मे २०० मे से १६३ सीटें दी लेकिन अफ़सोस की बात है कि भारत सरकार मे राजस्थान से एक भी केबीनेट मिनिस्टर नहीं बनाया। आपकी केबीनेट मे अनेक अयोग्य मंत्री है जो आपको नीचा दिखा रहे हैं लेकिन राजस्थान के कई योग्य  सांसदों को आपने केबीनेट मंत्री बनाने के योग्य नही समझा। यह राजस्थान की जनता का अपमान है और इसका ख़ामियाज़ा आपके दल को अगले चुनावों मे भुगतना होगा।

                 तीसरे, देश के  किसानो, कृषि और पशुपालन की दुर्दशा बढ़ती जा रही है और आपकी सरकार ने इस सम्बन्ध मे  कुछ करने की बात तो छोड़िए, बल्कि इस पर चिन्ता भी प्रकट नहीं की है।

                हमने, गम्भीर मुद्दे आपके ध्यान मे ला दिये हैं तथा आशा करते हैं कि आप इन पर गम्भीरता से विचार करेंगे।

                                                शुभकामनाओं सहित
भवदीय

(राजाराम मील)

अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

date 10-1-2018

प्रधानमंत्री जी , 
भारत सरकार,
नई दिल्ली

                विषय :- प्रधान मंत्री जी के झुंझुनू दौरे के सम्बन्ध मे

महोदय,

                आप इस माह झुंझुनू पधार रहे है, यह झुंझुनू की जनता के लिए गौरव की बात है। सीकर झुंझुनू जिले का एक गौरवशाली इतिहास एवं वर्तमान है। स्वतंत्रता के संघर्ष मे सीकर झुंझुनू के लोगों ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के आन्दोलन के समानान्तर एवं समकक्ष स्वतंन्त्रता का आनंदोलन चलाया था जो मूल रूप से जागीरदारों के विरूद्ध था तथा इसमें काफ़ी किसान शहीद हुए थे।

         देश की रक्षा के लिए यहाँ के लोगों मे विशेष जज़्बा है। यही वजह है कि इस जिले से देश की सेना एवं अर्द्ध सेनिक बलों मे सबसे अधिक युवा हैं। झुंझुनू जिले से साठ हज़ार सेवा निवृत तथा चालीस हज़ार सेवारत्त सेनिक है  और इतने ही अर्द्ध बलों से हैं। देश मे सबसे अधिक शहीद तथा वीरता के लिए सम्मानित सेनिक झुंझुनू जिले से है। देश की रक्षा के लिए