आरक्षण

31-7-2018

श्रीमती वसुन्धरा राजे जी,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- राजस्थान सरकार की आरक्षण नीति को ध्वंस्त एवं विकृत कर दिया गया है और प्रदेश की 15 प्रतिशत अनारक्षित जातियों को करीब-करीब 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।

महोदया,
राजस्थान में आरक्षण नीति को ध्वंस्त एवं विकृत किया जाकर मुस्किल से नाममात्र का आरक्षण दिया जा रहा है और अनारक्षित 15 प्रतिशत जातियों को असंवैधानिक, गैर कानूनी एवं अघोषित रूप से 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है इसका स्पष्ट उल्लेख निम्न प्रकार से हैः-
1. राज्य सरकार की नीति है कि भर्ती में अनुजाति/जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के क्रमशः 16, 12, 21 प्रतिशत पद आरक्षित किये जायेगे लेकिन किसी पद की रिक्तियों के सम्बन्ध में आरक्षित वर्गों की रिक्तियों के निर्धारण के लिये गिनती की जाती है कि उस सेवा या पद पर विभिन्न आरक्षित वर्गों के कितने-कितने कार्मिक पहले से सेवा में है। राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग के एक परिपत्र के अनुपालन का बहाना बनाकर यह गिनती की जाती है। आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि जो कार्मिक सामान्य कोटे में भर्ती हुये है या ओबीसी का आरक्षण लागू होने से पूर्व के भर्ती है उन्हें भी उनके वर्ग में गिनती की जाती है वस्तुतः इस गिनती की आवश्यकता ही नही है क्योंकि राज्य में किसी भी भर्ती में किसी भी वर्ग के आरक्षित वर्ग को उनके आरक्षित प्रतिशत से अधिक कार्मिको की भर्ती नही की जाती है तथा विभिन्न वर्गों का आरक्षण कोटा निश्चिित है तो पहले से सेवारत कार्मिको की गिनती क्यों की जाती है ?
2. टीएसपी जिलों में अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई आरक्षण नही है तथा सामान्य वर्ग का 50 प्रतिशत आरक्षण है। टीएसपी क्षेत्र की नियुक्तियों में काफी तरह की अनियमितताऐं हो रही है। टीएसपी क्षेत्र से बाहर के अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी टीएसपी क्षेत्र का मूलनिवास बनवाकर आरक्षण के आधार पर नियुक्तियां प्राप्त कर रहे। टीएसपी क्षेत्र में स्थानीय सामान्य वर्ग का आरक्षण समाप्त किया जाये।
3. राज्य सरकार के प्रतियोगिता परीक्षा के नियमों के नियम 15 में प्रावधान है कि प्रारम्भिक परीक्षा में प्रत्येक वर्ग का 15 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जायेगा। इस नियम की आड़ में आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड एवं अन्य नियुक्ति पदाधिकारी प्रारम्भिक परीक्षा में वरियता सूची से आरक्षित वर्ग एससी, एसटी, ओबीसी एवं एसबीसी के सफल अभ्यर्थियों को अलग छांटकर उनके आरक्षण प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित करते है जबकि वरियता सूची में शेष बचे जो केवल 15 प्रतिशत जनसंख्या के अनारक्षित जातियों से सम्बन्धित होते है उनको सामान्य वर्ग मानकर रिक्तियों के 50 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर देते है। इस तथ्य को ओर अधिक स्पष्ट करने के लिये यह कहना होगा कि अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थी 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पदों तथा 21 प्रतिशत ओबीसी के लिये आरक्षित पदों के लिये प्रतियोगिता करते है लेकिन उपरोक्त नियम 15 की गलत व्याख्या कर अन्य पिछड़ा वर्ग के 21 प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित किया जाता है। इसी प्रकार का अन्याय अनुसूचित जाति, जनजाति के अभ्यर्थियों के साथ भी होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके आरक्षण प्रतिशत तक की रिक्तियों के लिये ही सीमित कर दिया जाता है जबकि प्रदेश की अनारक्षित जातियां जिनकी जनसंख्या प्रदेश की कुल जनसंख्या का 15 प्रतिशत ही है उनके लिये प्रारम्भिक परीक्षा में 50 प्रतिशत रिक्तियों आरक्षित कर दी जाती है। राज्य सरकार के कार्मिक विभाग, आरपीएससी, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड और राजस्थान उच्च न्यायालय ने उपरोक्त नियम 15 की गलत व्याख्या कर अनारक्षित वर्ग को सामान्य वर्ग मानकर उन्हें प्रारम्भिक परीक्षा में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी है। इसका स्पष्ट उदाहरण पटवारी भर्ती परीक्षा 2015 है जिसमें ओबीसी के अभ्यर्थियों की न्यूनŸाम कट आॅफ 148, एससी की न्यूनŸाम कट आॅफ 112 और एसटी की न्यूनŸाम कट आॅफ 106 रखी, जबकि अनारक्षित अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर उनकी कटआॅफ 104 रखी। इसी प्रकार राजस्थान सिविल सेवा भर्ती 2013 में ओबीसी की न्यूनŸाम कट आॅफ 381 जबकि अनारक्षित अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर उनकी न्यूनŸाम कट आॅफ 350 रखी।
4. आरपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा या अन्य भर्तियों में भी साक्षात्कार के लिये तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाता है। इसके अन्तर्गत भी आरक्षित वर्गों को उनके आरक्षित प्रतिशत का तीन गुना तक ही सीमित कर दिया जाता है जबकि अनारक्षित जातियों को सामान्य वर्ग मानकर उन्हें कुल पदों का 50 प्रतिशत का तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाता है।
5. आररक्षण को लागू करने के लिये नीतिगत या लोजिकल प्रक्रिया यह है कि मैरीट सूची के प्रथम 50 प्रतिशत अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग के लिये अनारक्षित पदों पर नियुक्ति या प्रवेश दिया जाना होता है और सामान्य वर्ग के अन्तिम कटआॅफ के पश्चात आरक्षित वर्गों की सूची बनाई जाती है। विभिन्न विश्वविद्यालयों की प्रवेश में तथा कतिपय विभागों में की जा रही भर्ती में मैरीट सूची से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अलग छांटकर उनकी अलग सूची बना ली जाती है और उन्हें उनके
आरक्षित वर्ग में प्रवेश या नियुक्ति दे दी जाती है तथा चयन सूची/योग्यता सूची में शेष बचे अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर सामान्य वर्ग के 50 प्रतिशत पदों के विरूद्ध प्रवेश या नियुक्ति दे दी जाती है इस प्रकार आरक्षित वर्ग को 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पदों से बिलकूल वंचित कर दिया जाता है और अनारक्षित जाती के उम्मीदवारों को 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाता है।
6. आरक्षित सूची इस प्रकार बनाई जाती है कि उसमें एससी, एसटी एवं ओबीसी के मेरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को तो बिलकुल ही शामिल नही किया जाता तथा आरक्षित अभ्यर्थी उनके आरक्षण के प्रतिशत से काफी कम संख्या में समलित किये जाते है। इस अनियमितता को और अधिक स्पष्ट करने के लिये यह कहना होगा कि किसी भी भर्ती की रिक्तियो के 50 प्रतिशत पूर्व परिणाम को रिसफल कर आरक्षित सूची बनाई जानी चाहिये।
7. किसी भर्ती में सामान्य नियुक्तियों के विरूद्ध आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी यदि कार्य ग्रहण नही करते तो उनके स्थान पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को वरियता के आधार पर सामान्य वर्ग की नियुक्तियों में गिना जाना चाहिये और ऐसे आरक्षित अभ्यर्थी जो सामान्य नियुक्तियों के विरूद्ध गिने गये है उनके स्थानों को रिक्त मानकर सम्बन्धित आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ही नियुक्तिी दी जानी चाहिये लेकिन विभिन्न भर्ती प्राधिकारी आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड इस प्रक्रिया को नही अपनाते और सामान्य वर्ग के रिक्त रहे पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ही नियुक्ति दे देते है।
8. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के मामले में विश्वविद्यालयों को युनिट नही माना जाता बल्कि अलग-अलग विषयों और विषयों के अलग-अलग पदों को युनिट मानकर आरक्षित वर्ग को आरक्षण से वंचित किया जा रहा है।
9. न्याय शास्त्र का सामान्य सिद्धान्त है कि भर्तियों में पारदर्शिता होनी चाहिये। संविधान में प्रदत्त नागरिको के मूल अधिकारों प्रमुख्यतः आर्टिकल 14,15,16 का अभिप्राय भी यही है लेकिन भर्ती प्राधिकारी, आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड इत्यादि भर्तियों में बेईमानी एवं अनियमितता के छुपाने के लिये भर्तियों में पारदर्शिता नही रखते। स्थिति यह है कि आरपीएससी के परिणाम में अभ्यर्थी केवल अपने ही प्राप्तांक देख सकता है जबकि किसी भी अभ्यर्थी को समस्त परिणाम, समस्त अभ्यर्थियों के अंक, वरियता इत्यादि देखने की छुट होनी चाहिये।
10. राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 21 प्रतिशत है अतः ओबीसी का आरक्षण कुल रिक्त पदों के 21 प्रतिशत तय होना चाहिये। संविधान में भी प्रावधान है कि बैकलाॅग के पदों की गिनती के लिये ‘‘50 प्रतिशत से अधिक पदों पर आरक्षण नही होने का’’ नियम लागू नही होगा। अतः एससी, एसटी के बैंकलाॅग के पदों को 50 प्रतिशत सामान्य पदों में से घटाना चाहिये लेकिन बैकलाॅग के पदों को कुल पदों में से घटाकर उसके पश्चात शेष रहे पदों पर ओबीसी का 21 प्रतिशत आरक्षण तय किया जाता है इस प्रकार ओबीसी का आरक्षण राज्य सरकार द्वारा तय आरक्षण प्रतिशत से कम निर्धारित किया जाता है।
11. दण्डवत आरक्षण में सामान्य वर्ग का गलत अर्थ निकालनाः- आयोग एवं कर्मचारी चयन बोर्ड के अधिकारी दण्डवत आरक्षण (महिला, भूतपूर्व सैनिक, विकलांग, उत्कृष्ट खिलाड़ी एवं मंत्रालयिक कर्मचारी) में सामान्य वर्ग का अर्थ अनारक्षित वर्ग से लगाकर 8 प्रतिशत लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देते है एवं ओबीसी के 54 प्रतिशत लोगों को 21 प्रतिशत में समायोजित करते है। जबकि नियमों में साफ लिखा हुआ है कि जो जिस वर्ग का होगा उसे उसी वर्ग में समायोहित किया जायेगा। सामान्य वर्ग कोई वर्ग नही है यह मेरिट आधार पर चयनित सभीे वर्गों के अभ्यर्थियों के लिये उपलब्ध है। अतः हमारा निवेदन है कि सामान्य वर्ग का आशय दण्डवत आरक्षण में मैरिट आधार से चयनित अभ्यर्थियों से लगाया जाये एवं मैरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को ही सामान्य वर्ग में समायोजित किया जाये।
12. केन्द्र सरकार एवं देश के सभी राज्यों में ओबीसी क्रिमीलियर की सीमा रूपये 8 लाख है लेकिन राजस्थान के कार्मिक विभाग के अधिकारी राजस्थान हाईकोर्ट का बहाना बताकर आज भी क्रिमीलियर की सीमा को रूपये 2.5 लाख कर रखा है। हाईकोर्ट ने क्रिमीलियर बढ़ाने के आदेश दे दिये है फिर भी सरकार द्वारा क्रिमीलियर की सीमा नही बढ़ाई जा रही है।
13. नेशनल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर की स्थापना राजस्थान विधानसभा के एक्ट द्वारा की गई है। मूल अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान था लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन और तत्समय के विधि मंत्री घनश्याम तिवाड़ी ने अधिनियम में संशोधन कर अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान हटा दिया और एससी, एसटी के आरक्षण का प्रावधान भी विश्वविद्यालय की मर्जी पर रख दिया। आरक्षण के सम्बन्ध में राज्य सरकार की स्पष्ट नीति है कि राज्य की सभी विश्वविद्यालय, काॅलेजों में एससी, एसटी एवं ओबीसी का आरक्षण रहेगा और उस स्थिति में नेशनल विधि विश्वविद्यालय इसकी पालना क्यों नही कर रहा है। नेशनल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर छात्रों के प्रवेश एवं शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण तब ही लागू करेगा जब राज्य सरकार विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर आरक्षण के मेन्डेट्री प्रावधान करें।

इससे स्पष्ट है कि राजस्थान में आरक्षण नीति को पूर्णत्या ध्वंस्त एवं विकृत कर दिया गया है और इसमें कार्मिक विभाग एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग की भी प्रमुख भूमिका है। हम पिछले 15 वर्ष से राज्य सरकार को इस स्थिति से अवगत कराते आ रहे है राजस्थान की आरक्षण नीति ठीक प्रकार से तब ही लागू हो सकती है जब राज्य सरकार आरक्षण को लागू करने के लिये विस्तृत प्रक्रिया कानून बनाकर निर्धारित कर दे। यदि सरकार कानून बनाकर आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया निर्धारित कर दे तो विभिन्न प्राधिकारियों की मनमानी पर प्रतिबन्ध लगेगा, न्यायालय भी मनमानी व्याख्या नही कर पायेगे, भर्तियों में विलम्ब नही होगा तथा बैरोजगार युवाओं को न्याय एवं राहत मिलेगी।

                               सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष

 

date 25-7-2018

श्री नरेन्द्र मोदी,
माननीय प्रधानमंत्री,
प्रधानमंत्री कार्यालय, नई दिल्ली।

विषयः- राजस्थान सरकार की आरक्षण नीति को ध्वंस्त एवं विकृत कर दिया गया है और प्रदेश की 15 प्रतिशत अनारक्षित जातियों को करीब-करीब 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।

महोदय,
राजस्थान में आरक्षण नीति को ध्वंस्त एवं विकृत किया जाकर अनारक्षित 15 प्रतिशत जातियों को असंवैधानिक, गैर कानूनी एवं अघोषित रूप से 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है इसका स्पष्ट उल्लेख निम्न प्रकार से हैः-
1. किसी पद की रिक्तियों के सम्बन्ध में आरक्षित वर्गों की रिक्तियों के निर्धारण के लिये गिनती की जाती है कि उस सेवा या पद पर विभिन्न आरक्षित वर्गों के कितने-कितने कार्मिक पहले से सेवा में है। राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग के एक परिपत्र के अनुपालन का बहाना बनाकर यह गिनती की जाती है। राज्य सरकार की नीति है कि भर्ती में अनुजाति/जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के क्रमशः 16, 12, 21 प्रतिशत पद आरक्षित किये जायेगे। इस प्रावधान को विकृत करने के लिये सेवामें पहले से कार्यरत कार्मिको की गिनती की जाती है। आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि जो कार्मिक सामान्य कोटे में भर्ती हुये है या ओबीसी का आरक्षण लागू होने से पूर्व के भर्ती है उन्हें भी उनके वर्ग में गिनती की जाती है वस्तुतः इस गिनती की आवश्यकता ही नही है क्योंकि राज्य में किसी भी भर्ती में किसी भी वर्ग के आरक्षित वर्ग को उनके आरक्षित प्रतिशत से अधिक कार्मिको की भर्ती नही की जाती है।
2. टीएसपी जिलों में अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई आरक्षण नही है तथा सामान्य वर्ग का 50 प्रतिशत आरक्षण है। टीएसपी क्षेत्र की नियुक्तियों में काफी तरह की अनियमितताऐं हो रही है। टीएसपी क्षेत्र से बाहर के अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी टीएसपी क्षेत्र का मूलनिवास बनवाकर आरक्षण के आधार पर नियुक्तियां प्राप्त कर रहे। टीएसपी क्षेत्र में सामान्य वर्ग का आरक्षण समाप्त किया जाये। सामान्य वर्ग की रिक्तियों को कुल पदों में जोड़ा जायें।
3. राज्य सरकार के प्रतियोगिता परीक्षा के नियमों के नियम 15 में प्रावधान है कि प्रारम्भिक परीक्षा में प्रत्येक वर्ग का 15 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जायेगा। इस नियम की आड़ में आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड एवं अन्य नियुक्ति पदाधिकारी प्रारम्भिक परीक्षा में वरियता सूची से आरक्षित वर्ग एससी, एसटी, ओबीसी एवं एसबीसी के सफल अभ्यर्थियों को अलग छांटकर उनके आरक्षण प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित करते है जबकि वरियता सूची में शेष बचे जो केवल 15 प्रतिशत जनसंख्या के अनारक्षित जातियों से सम्बन्धित होते है उनको सामान्य वर्ग मानकर रिक्तियों के 50 गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर देते है। इस तथ्य को ओर अधिक स्पष्ट करने के लिये यह कहना होगा कि अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थी 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पदों तथा 21 प्रतिशत ओबीसी के लिये आरक्षित पदों के लिये प्रतियोगिता करते है लेकिन उपरोक्त नियम 15 की गलत व्याख्या कर अन्य पिछड़ा वर्ग के 21 प्रतिशत का 15 गुना अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित किया जाता है। इसी प्रकार का अन्याय अनुसूचित जाति, जनजाति के अभ्यर्थियों के साथ होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके आरक्षण प्रतिशत तक की रिक्तियों के लिये ही समिति कर दिया जाता है जबकि प्रदेश की अनारक्षित जातियां जिनकी जनसंख्या प्रदेश की कुल जनसंख्या का 15 प्रतिशत ही है उनके लिये प्रारम्भिक परीक्षा में 50 प्रतिशत रिक्तियों आरक्षित कर दी जाती है। राज्य सरकार के कार्मिक विभाग, आरपीएससी, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड और राजस्थान उच्च न्यायालय ने उपरोक्त नियम 15 की गलत व्याख्या कर अनारक्षित वर्ग को सामान्य वर्ग मानकर उन्हें प्रारम्भिक परीक्षा में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी है। इसका स्पष्ट उदाहरण पटवारी भर्ती परीक्षा 2015 है जिसमें ओबीसी के अभ्यर्थियों की न्यूनŸाम कट आॅफ 148, एससी की न्यूनŸाम कट आॅफ 116 और एसटी की न्यूनŸाम कट आॅफ 112 रखी, जबकि अनारक्षित अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर उनकी कटआॅफ 104 रखी। इसी प्रकार राजस्थान सिविल सेवा भर्ती 2013 में ओबीसी की न्यूनŸाम कट आॅफ 381 जबकि अनारक्षित अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर उनकी न्यूनŸाम कट आॅफ 350 रखी।
4. आरपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा या अन्य भर्तियों में भी साक्षात्कार के लिये तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाता है। इसके अन्तर्गत भी आरक्षित वर्गों को उनके आरक्षित प्रतिशत का तीन गुना तक ही सीमित कर दिया जाता है जबकि अनारक्षित जातियों को सामान्य वर्ग मानकर उन्हें कुल पदों का 50 प्रतिशत का तीन गुना अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया जाता है।
5. आररक्षण को लागू करने के लिये नीतिगत या लोजिकल प्रक्रिया यह है कि मैरीट सूची के प्रथम 50 प्रतिशत अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग के लिये अनारक्षित पदों पर नियुक्ति या प्रवेश दिया जाना होता है और सामान्य वर्ग के अन्तिम कटआॅफ के पश्चात आरक्षित वर्गों की सूची बनाई जाती है। विभिन्न विश्वविद्यालयों की प्रवेश में तथा कतिपय विभागों में की जा रही भर्ती में मैरीट सूची से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अलग छांटकर उनकी अलग सूची बना ली जाती है और उन्हें उनके आरक्षित वर्ग में प्रवेश या नियुक्ति दे दी जाती है तथा चयन सूची/योग्यता सूची में शेष बचे अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग मानकर सामान्य वर्ग के 50 प्रतिशत पदों के विरूद्ध प्रवेश या नियुक्ति दे दी जाती है इस प्रकार आरक्षित वर्ग को 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पदों से बिलकूल वंचित कर दिया जाता है और अनारक्षित जाती के उम्मीदवारों को 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाता है।

6. आरक्षित सूची इस प्रकार बनाई जाती है कि उसमें एससी, एसटी एवं ओबीसी के मेरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को तो बिलकुल ही शामिल नही किया जाता तथा आरक्षित अभ्यर्थी उनके आरक्षण के प्रतिशत से काफी कम संख्या में समलित किये जाते है। इस अनियमितता को और अधिक स्पष्ट करने के लिये यह कहना होगा कि किसी भी भर्ती की रिक्तियो के 50 प्रतिशत पूर्व परिणाम को रिसफल कर आरक्षित सूची बनाई जाती है। वस्तुस्थिति यह होती है कि आयोग के अधिकारियों को या तो परिणाम को रिसफल करना नही आता या करना नही चाहते। आयोग द्वारा 11 मार्च 2014 से जनवरी 2017 तक कई परिणामों को रिसफल भी किया है। अब वापिस आयोग के कर्मचारी परिणाम रिसफल करना किस स्वार्थ के कारण भूल रहे है यह जांच का विषय है?

7. किसी भर्ती में सामान्य नियुक्तियों के विरूद्ध आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी यदि कार्य ग्रहण नही करते तो उनके स्थान पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को वरियता के आधार पर सामान्य वर्ग की नियुक्तियों में गिना जाना चाहिये और ऐसे आरक्षित अभ्यर्थी जो सामान्य नियुक्तियों के विरूद्ध गिने गये है उनके स्थानों को रिक्त मानकर सम्बन्धित आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ही नियुक्तिी दी जानी चाहिये लेकिन विभिन्न भर्ती प्राधिकारी आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड इस प्रक्रिया को नही अपनाते और सामान्य वर्ग के रिक्त रहे पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ही नियुक्ति दे देते है।
8. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के मामले में विश्वविद्यालयों को युनिट नही माना जाता बल्कि अलग-अलग विषयों और विषयों के अलग-अलग पदों को युनिट मानकर आरक्षित वर्ग को आरक्षण से वंचित किया जा रहा है।
9. न्याय शास्त्र का सामान्य सिद्धान्त है कि भर्तियों में पारदर्शिता होनी चाहिये। संविधान में प्रदत्त नागरिको के मूल अधिकारों प्रमुख्यतः आर्टिकल 14,15,16 का अभिप्राय भी यही है लेकिन भर्ती प्राधिकारी, आरपीएससी, कर्मचारी चयन बोर्ड इत्यादि भर्तियों में बेईमानी एवं अनियमितता के छुपाने के लिये भर्तियों में पारदर्शिता नही रखते। स्थिति यह है कि आरपीएससी के परिणाम में अभ्यर्थी केवल अपने ही प्राप्तांक देख सकता है जबकि किसी भी अभ्यर्थी को समस्त परिणाम, समस्त अभ्यर्थियों के अंक, वरियता इत्यादि देखने की छुट होनी चाहिये।
10. राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 21 प्रतिशत है अतः ओबीसी का आरक्षण कुल रिक्त पदों के 21 प्रतिशत तय होना चाहिये। संविधान में भी प्रावधान है कि बैकलाॅग के पदों की गिनती के लिये ‘‘50 प्रतिशत से अधिक पदों पर आरक्षण नही होने का’’ नियम लागू नही होगा। अतः एससी, एसटी के बैंकलाॅग के पदों को 50 प्रतिशत सामान्य पदों में से घटाना चाहिये लेकिन बैकलाॅग के पदों को कुल पदों में से घटाकर उसके पश्चात शेष रहे पदों पर ओबीसी का 21 प्रतिशत आरक्षण तय किया जाता है इस प्रकार ओबीसी का आरक्षण राज्य सरकार द्वारा तय आरक्षण प्रतिशत से कम निर्धारित किया जाता है।
11. दण्डवत आरक्षण में सामान्य वर्ग का गलत अर्थ निकालनाः- आयोग एवं कर्मचारी चयन बोर्ड के अधिकारी दण्डवत आरक्षण (महिला, भूतपूर्व सैनिक, विकलांग, उत्कृष्ट खिलाड़ी एवं मंत्रालयिक कर्मचारी) में सामान्य वर्ग का अर्थ अनारक्षित वर्ग से लगाकर 8 प्रतिशत लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देते है एवं ओबीसी के 54 प्रतिशत लोगों को 21 प्रतिशत में समायोजित करते है। जबकि नियमों में साफ लिखा हुआ है कि जो जिस वर्ग का होगा उसे उसी वर्ग में समायोहित किया जायेगा। सामान्य वर्ग कोई वर्ग नही है यह मेरिट आधार पर चयनित सभीे वर्गों के अभ्यर्थियों के लिये उपलब्ध है। अतः हमारा निवेदन है कि सामान्य वर्ग का आशय दण्डवत आरक्षण में मैरिट आधार से चयनित अभ्यर्थियों से लगाया जाये एवं मैरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को ही सामान्य वर्ग में समायोजित किया जाये।
12. केन्द्र सरकार एवं देश के सभी राज्यों में ओबीसी क्रिमीलियर की सीमा रूपये 8 लाख है लेकिन राजस्थान के कार्मिक विभाग के अधिकारी राजस्थान हाईकोर्ट का बहाना बताकर आज भी क्रिमीलियर की सीमा को रूपये 2.5 लाख कर रखा है।

इससे स्पष्ट है कि राजस्थान में आरक्षण नीति को पूर्णत्या ध्वंस्त एवं विकृत कर दिया गया है और इसमें कार्मिक विभाग एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग की भी प्रमुख भूमिका है। हम पिछले 15 वर्ष से राज्य सरकार को इस स्थिति से अवगत कराते आ रहे है राजस्थान की आरक्षण नीति ठीक प्रकार से तब ही लागू हो सकती है जब राज्य सरकार आरक्षण को लागू करने के लिये विस्तृत प्रक्रिया कानून बनाकर निर्धारित कर दे। यदि सरकार कानून बनाकर आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया निर्धारित कर दे तो विभिन्न प्राधिकारियों की मनमानी पर प्रतिबन्ध लगेगा, न्यायालय भी मनमानी व्याख्या नही कर पायेगे, भर्तियों में विलम्ब नही होगा तथा बैरोजगार युवाओं को न्याय एवं राहत मिलेगी।

यह बड़ा ही आश्चर्य एवं खेद का विषय है कि राज्य सरकार ने इस स्थिति पर मौन साध रखा है या यह कहा जा सकता है कि राज्य सरकार ने आरक्षण को ध्वंस्त एवं विकृत करने की पूरी छूट दे रखी है।
अतः निवेदन है कि भारत सरकार इस मामले में हस्तक्षेप कर राजस्थान सरकार को समुचित निर्देश देने की कृपा करें।

सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष

 

Date 25-7-2018

श्रीमती वसुन्धरा राजे जी,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।
 
विषयः- राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा सीधी भर्ती में रिजर्व लिस्ट के संधारण के लिये राजस्थान सरकार के परिपत्र नम्बर एफ 7 (2) डीओपी/ए-2/81 पीटी दिनांक जुलाई 19, 2001 के प्रावधानो के तहत राजस्थान सरकार की आरक्षण नीति को विकृत किया जा रहा है के सम्बन्ध में।
 
महोदया,
राजस्थान सरकार के उपरोक्त परिपत्र के अनुसरण में आरपीएससी द्वारा आरक्षित सूची बनाई जाती है जो इस प्रकार से बनाई जा रही है कि आरक्षित सूची में आरक्षित वर्ग का एक भी अभ्यर्थी नही रखा जाता।
परिपत्र में प्रावधान है कि आरक्षित सूची नोटिफाईड रिक्तियां की डेड गुना होगी। यह सामान्य जानकारी का विषय है कि नोटिफाई रिक्तियों के विरूद्ध नियुक्तियां दिये जाने पर नोटिफाईड रिक्तियों के लिये बनाई गई सूची और रिजर्व सूची के अन्तिम अभ्यर्थी तक आरक्षित वर्ग के सभी अभ्यर्थी मूल नियुक्ति सूची में ही नियुक्ति पा जाते है इसलिये रिजर्व सूची में आरक्षित वर्ग का कोई भी अभ्यर्थी नही रहता है।
हाॅल ही लिपिक भर्ती 2013 में रिजर्व लिस्ट से नियुक्ति का मामला आरपीएससी के विचाराधीन आया। लेकिन रिजर्व सूची में आरक्षित वर्ग विशेषकर अनुसूचित जनजाति का और अन्य पिछड़ा वर्ग के कुछ ही अभ्यर्थी है आरपीएससी ने इस स्थिति की समिक्षा की तो पाया कि रिजर्व सूची की नियुक्ति में राजस्थान सरकार की आरक्षित नीति के अनुसार ओबीसी के 450 तथा एससी, एसटी के 50 अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलनी चाहिये। इसी प्रकार पीटीआई की आरक्षित सूची की नियुक्तियों के विरूद्ध आरक्षित वर्ग के 80 अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलनी चाहिये लेकिन उपरोक्त परिपत्र के अनुसार आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति नही मिल रही है। पीटीआई भर्ती के मामले में आरपीएससी ने कार्मिक विभाग को कई बार इस विकृति का निदान करने हेतु लिखा लेकिन कार्मिक विभाग हर बार आरपीएससी को यही जबाब देता है कि राज्य सरकार के परिपत्र के अनुसार कार्यवाही करो। स्थिति यह बन रही है कि आरक्षित सूची के विरूद्ध जो नियुक्तियां दी जानी होती है उनके विरूद्ध अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ही नियुक्ति दिये जाने की मजबूरी बन रही है। लिपिक भर्ती 2013 की नियुक्तियों के सम्बन्ध में भी राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन ने उक्त मामले में आरक्षित वर्ग को राहत देने के लिये परिपत्र के परिपेक्ष्य में राजस्थान सरकार को स्पष्टीकरण के लिये निवेदन किया है लेकिन राज्य सरकार का कार्मिक विभाग जो कि राजस्थान के आरक्षण नीति के बिलकूल खिलाफ में है इसलिये वे आरक्षित वर्ग को कोई राहत नही देना चाहते और इसलिये आरपीएससी जब भी आरक्षण के सम्बन्ध में कोई सापेक्ष सुझाव देती है तो कार्मिक विभाग आरक्षण वर्ग के विपरित ही कार्यवाही के निर्देश देता है।
महोदया, सूप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश है कि आरक्षण नीति को लागू करने के लिये सरकार को प्रो एक्टिव दृष्टिकोण अपनाना चाहिये जबकि राजस्थान सरकार का कार्मिक विभाग इसके विपरित अनारक्षित वर्ग के पक्ष में प्रोएक्टिव दृष्टिकोण अपनाकर राज्य सरकार की आरक्षण नीति को धवस्त एवं विकृत कर रहा है। स्थिति यह है कि नियुक्ति के हर स्टेज पर आरक्षित अभ्यर्थियों को पीछे धकेलते-धकेलते नियुक्ति के अन्तिम स्तर तक आरक्षण को घोषित नीति का केवल 20-25 प्रतिशत से आगे नही बढ़ने देते अर्थात अनुसूचित जाति का आरक्षण यदि 16 प्रतिशत है तो आरक्षित वर्ग के 4 प्रतिशत से कम ही अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिल पाती है।
सरकार की आरक्षण नीति को किस प्रकार धवस्त एवं विकृत किया जा रहा है इसके सम्बन्ध में आपको पूर्व में भी अवगत कराया है तथा हम पुनः अलग से अवगत करा रहे है।
महोदया, हम आपको अवगत करा दे कि राज्य सरकार की आरक्षण नीति को धवस्त एवं विकृत किये जाने की वजह से प्रदेश के आरक्षित वर्ग का सरकार के प्रति घोर निराशा एवं आक्रोश है। इस सम्बन्ध में हम आपको बार-बार अवगत करा रहे है लेकिन सरकार का कार्मिक विभाग दोष का कोई निराकरण नही कर रहा है उक्त स्थिति से आगामी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को गम्भीर विपरित परिणाम देखने पड़ेगे।
अतः हमारा पुनः निवेदन है कि कृपया राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू किये जाने के सम्बन्ध में हमारे पत्र के परिपेक्ष्य में समीक्षा कर कठिनाईयां, बधायें एवं विकृतियों का निराकरण करने की कृपा करें।
सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
Mob 9829010221

Date 21-7-2018

श्री नरेन्द्र मोदी,
माननीय प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- राजस्थान लोक सेवा आयोग में अपने रिश्तेदारों के लिये परिणाम में अनियमितता।

महोदय,
राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा 19.7.2018 को जारी लिपिक ग्रेड द्वितीय प्रतियोगी परीक्षा 2013 के परिणाम में वहां पर नियुक्त उपसचिव एवं वहां के बाबूओं ने अपने रिश्तेदारों का चयन सुनिश्चित करने के लिये राज्य सरकार की आरक्षण नीति एवं राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले (जटा शंकर यादव, पीटीआई) को नजरअंदाज कर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों का कटआॅफ 184 तक एवं ओबीसी का कट आॅफ भी 184 रखा है। एससी, एसटी एवं ओबीसी के अभ्यर्थी जो 184 से 194 तक प्राप्तांक द्वारा चयनित हुये है उनको सामान्य वर्ग में नही समायोजित किया गया है। अर्थात 184 से 194 अंक वाले आरक्षित वर्ग (एससी, एसटी एवं ओबीसी) अभ्यर्थी आरक्षित वर्ग में ही चयनित है, जो सरकार की आरक्षण नीति का खुला उल्लघन एवं मखौल उड़ाया गया है। आरक्षण नियमों के अनुसार सामान्य वर्ग में मेरीट आधार पर चयन होना चाहिये। मेरीट के बाद में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का चयन किया जाना चाहिये। आयोग द्वारा इसी तरह दण्डवंत आरक्षण (विकलांग, उत्कृष्ट खिलाड़ी, भूतपूर्व सैनिक एवं मंत्रालयिक कर्मचारी/नाॅन गजीटेड) में भी अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का चयन कम अंक पर तथा आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का अधिक अंको पर चयन किया जाता है तथा अनारक्षित वर्ग के कम अंक वाले अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में (मेरीट) समायोजित किया जाता है एवं आरक्षित वर्ग के अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को आरक्षित वर्ग में समायोजित किया जा रहा है, जबकि आरक्षण नियमों के अनुसार 50 प्रतिशत अभ्यर्थियों का चयन मेरीट आधार पर एवं 50 प्रतिशत अभ्यर्थियों का चयन आरक्षण के आधार पर कर मेरीट वाले अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में एवं आरक्षण के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों का समायोजन आरक्षित वर्ग में करना चाहिये। आयोग का प्रत्येक परिणाम इसी कारण हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में जा रहा है।
अतः आयोग द्वारा जारी उक्त परिणाम को संशोधित करावे, दण्डवंत आरक्षण में 50 प्रतिशत मेरीट आधार पर चयनित कर उन्हें सामान्य वर्ग में एवं उससे कम अंक वाले 50 प्रतिशत अभ्यर्थियों का चयन आरक्षित वर्ग में कर उन्हें आरक्षित वर्ग में समायोजित करावे, इटरनेट पर ओएमआर सीट, मेरीट क्रमांक, प्राप्तांक, वर्ग, जन्म तिथि एवं नाम सार्वजनिक कर पारदर्शिता अपनावे, अधिकारियों को नियमो के लिये प्रशिक्षण दिया जावे, आरक्षण नियमों को स्कूल व काॅलेज के पाठ्यक्रम में शामिल कराने एवं आरक्षण नियमों की अवहेलना पर दण्ड का प्रावधान करने हेतु मुख्य सचिव, कार्मिक सचिव एवं आयोग के सचिव को निर्देशित करने की कृपा करें।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष

dated 1-7-2018

दलित एवं पिछड़ों वर्गों ने बड़े संघर्ष के पश्चात आरक्षण प्राप्त किया। आरक्षण के अभाव में अनुसूचित जाति/जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को राज्य की सेवाओं में स्थान प्राप्त करना बड़ा कठिन एवं असम्भव सा था। कुछ जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल करने से वंचित कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप उन जातियों के युवाओं का राज्य की सेवाओं में आने के रास्ते एवं सम्भावनाऐं करीब-करीब बाधित हो गई। यही नही स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज संस्थाओं में कुछ समाजो का आरक्षण नही होने की वजह का प्रतिनिधित्व भी असम्भव हो गया। इसी परिपेक्ष्य में आरक्षण से वंचित समाज के प्रबुद्धजनों एवं जनसामान्य ने आरक्षण के लिये संघर्ष किया और वंचित समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित करवाया। यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के संघर्ष का नेतृत्व अधिकाशतः क्रिमीलियर से सम्बन्धित जनों ने ही किया।

आरक्षण के पश्चात अनारक्षित जातियां आरक्षण को समाप्त करने के लिये भरषक पर्यतन कर रही है। जिसके परिणाम यह हुआ है कि फिलहाल राजस्थान में अनारक्षित जातिया को सामान्य जाति मानकर अनारक्षित सभी 50 प्रतिशत पद दिये जा रहे है इस प्रकार अनारक्षित जातिया जिनकी जनसंख्या 15 प्रतिशत से भी कम है अप्रत्यक्ष रूप से 50 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त कर रही है। कहने का तात्पर्य है कि राज्य सेवाओं एवं शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में आरक्षण को करीब-करीब समाप्त ही कर दिया है। गत वर्ष पटवार परीक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग के न्यूनतम कट ऑफ अंक 147, एससी के 112 तथा एसटी के न्यूनतम कट ऑफ 106 रखे जबकि अनारक्षित वर्ग की कट ऑफ 104 रखे। इसी प्रकार राजस्थान सिविल सेवा परीक्षा 2013 के साक्षात्कार के लिये अन्य पिछड़ा वर्ग के न्यूनतम कट ऑफ 381 रखे जबकि अनारक्षित वर्ग को सामान्य वर्ग मानते हुये न्यूनतम कट ऑफ 250 अंक रखे। एक दो-उदाहरण ओर- जयपुर कलेक्टर ने ड्राईवर के 40 पद अधिसूचित किये थे लेकिन इसके विरूद्ध विभिन्न विभागों के लिये 350 ड्राईवरों की भर्ती कर ली जिसमें किसी भी वर्ग का आरक्षण नही रखा] इसी प्रकार ग्राम सेवकों की भर्ती में मनमानी तरीके से ओबीसी का आरक्षण जो कि 659 पद बनते थे उसके विरूद्ध मात्र 123 पद रखे और बड़ी जदो-जहद एवं संघर्ष के बाद केवल मात्र 334 पद किये। इसी प्रकार राज्य सरकार की हर भर्ती में और हर स्तर पर तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश एवं नियुक्ति पर आरक्षित वर्गों के साथ भेद-भाव, अनियमितताऐं एवं अन्याय किया जाकर आरक्षण को करीब-करीब समाप्त सा ही कर दिया है।

राजस्थान जाट महासभा आरक्षण को बनाये रखने के लिये पिछले 20 साल से संघर्षरत है मेरी अध्यक्षता में आरक्षण अधिकार मंच भी बनाया हुआ है जिसमें सभी आरक्षित वर्गों के प्रबुद्ध व्यक्ति, सेवानिवृत वरिष्ठतम अधिकारी आईएएस, आईपीएस, आरएएस, आरपीएस, आरजेएस एवं अन्य सेवाओं के अधिकारी जुड़े हुये है तथा आरक्षित वर्ग के अधिकारो के लिये संघर्षरत है। आरक्षण की वजह से गरीब दलित, जनजाति, किसान, श्रमिकों के बच्चों को उनका हक प्राप्त होता है इसलिये सभी का सहयोग से ही आरक्षण अधिकार बने रह सकते है।

ऐसी स्थिति में आरक्षित वर्गें के सभी वर्गों के प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वे आरक्षण के अधिकार को बनाये रखने के लिये भरषक पर्यतन एवं सहयोग करे। लेकिन यह देखने में आया है कि क्रिमीलियर के कुछ अभ्यर्थी या उनके अभिभावक भी अपने निजी स्वार्थ के लिये आरक्षण समर्थन नही करने की बजाय विरोध करते है। फिलहाल राजस्थान उच्च न्यायालय ने आरक्षण के विरोध में कई निर्णय दिये लेकिन आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी इन निर्णयों से पीड़ित नही थे वे न्यायालय के ऐसे आरक्षण विरोधी एवं संवैधानिक निर्णयों का समर्थन कर रहे है। यदि यही स्थिति रही तो एक न एक दिन आरक्षण न्यूनतम स्तर पर पहुच जाना है एवं उस स्थिति में अनारक्षित वर्ग आरक्षित वर्ग से सम्बिन्धित अभ्यर्थियों चाहे वे क्रिमीलियर में ही हो उन्हें उनके शिक्षण संस्थानों में प्रवेश या राज्य सेवाओं में नही आने देगे।

राजाराम मील

मो0 9829010221

 

dated 30-6-2018

श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी,

प्रधानमंत्री,

भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- राजस्थान सरकार द्वारा आरक्षित वर्ग (एससी, एसटी एवं ओबीसी) को उनके संवैधानिक अधिकार दिये जाने के सम्बन्ध में।

महोदय,

                निवेदन है कि आरक्षण अधिकार मंच की पिछले दिनों में हुई मीटिग में इन वर्गों को उनके संविधानिक अधिकारों से वंचित करने के सम्बन्ध में सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किये। निम्न मामलों में इन वर्गों के साथ न्याय नही हो रहा हैः-

  1. राजस्थान में आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी मेरिट में आते है उन्हें योग्यता श्रेणी में शामिल नही कर आरक्षित पदों पर ही नियुक्ति दी जा रही है, जो असंवैधानिक है इससे अनारक्षित वर्ग का 50 प्रतिशत आरक्षण बन गया है। इस सम्बन्ध में राज्य सरकार एवं उनके विभिन्न विभागों को कई बार लिखा जा चुका है लेकिन इस पर कोई विचार नही किया जा रहा है।
  2. राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग की क्रिमीलियर दो लाख पचार हजार रूपये निर्धारित की हुई है जबकि केन्द्र सरकार एवं अन्य राज्यों में आठ लाख रूपये वार्षिक है। इस सम्बन्ध में भी राज्य सरकार को कई बार लिखने के बाद भी कोई कार्यवाही नही हो रही है। इसको केन्द्र सरकार के समान किया जाना चाहिये।
  3. सरकारी सेवाओं में अस्थाई एवं कांट्रेक्ट के आधार पर दी जा रही नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था की जावे।
  4. भारत सरकार द्वारा संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी प्राईवेट कम्पनियों से लिये जाने की चर्चा है यह असंवैधानिक है फिर भी भर्ती किये जाते है तो आवश्यक रूप से इसमें भी आरक्षण का प्रावधान किया जावें।
  5. न्याययिक सेवाओं में आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व नगण्य है यह सुनिश्चित करने के लिये संविधान के प्रावधान एवं विधि आयोग की अनुशंषा के आधार पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (आाई जे एस) गठित करने की व्यवस्था की जावे, जिसमें आरक्षण की व्यवस्था की जावे।
  6. सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण/गणना के आंकेड़े सार्वजनिक किये जावे तथा इसके आधार पर ही योजनाऐं बनाई जावे। बजट का तदानुसार प्रावधान किया जावे।
  7. आरक्षित वर्ग की जनसंख्या लगभग 85 प्रतिशत है। जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था करने के उपरान्त ही अन्य पिछड़ा वर्ग में वर्गीकरण की व्यवस्था की जा सकती है उससे पहले वर्गीकरण करने की योजना का यह मंच विरोध करता है क्योंकि यह समाज को बाटने की साजिश प्रतीत होती है।
  8. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों के चलते आरक्षित वर्ग को भारी हानि हो रही है इसलिये विभाग के स्थान पर केवल विश्वविद्यालय को एक इकाई मानने के पश्चात आरक्षण की व्यवस्था की जावे।
  9. अनुसूचित जाति के विकास हेतु एससी कम्पोनेट प्लान एंव अनुसूचित जनजाति के लिये ट्राईबल सब प्लान के अन्तर्गत विशेष धनराशि आवंटित की जाती है इसी तर्ज पर अन्य पिछड़ा वर्ग का कम्पोनेट प्लान का प्रावधान किया जाकर उसे शीघ्र लागू किया जावे।
  10. राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय जोधपुर में आरक्षण की व्यवस्था नही है इसके सम्बन्ध में राज्य सरकार को बार-बार अवगत कराया गया लेकिन अभीतक आरक्षण की व्यवस्था नही हुई है। अन्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों की तरह जोधपुर में स्थिति राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में आरक्षण की व्यवस्था की जावे।
  11. योग्यता के आधार पर (मेरिट आधार) चयनित कर्मचारियों की गणना योग्यता वर्ग में कर आरक्षित वर्ग के बैकलाॅग के पदों को अभियान चलाकर प्राथमिकता से भरे जावे।
  12. ट्रीब्यूनल, उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जावे। इसी प्रकार विधि आयोग में भी आरक्षित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जावे।
  13. संघ लोक सेवा आयोग एवं राज्य लोक सेवा आयोग में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जावे।

                राजस्थान आरक्षण अधिकार मंच को पूर्ण विश्वास है कि श्रीमान उपरोक्त बिन्दुओं को जल्दी ही लागू करवाने की व्यवस्था करायेगे जिससे मंच श्रीमान का आभारी रहेगा।

                                                                सादर।

(सत्यनारायण सैनी)         (रामलुभाया)              (राजाराम मील)

(बीएल वर्मा)            (राजपाल मीणा)             (वीरेन्द्र सिंह रावणा)

(आर के आंकोदिया)        (आर0 एस0 जाखड़)        (महेन्द्र सिंह)

(ओबीसी सत्यनारायण सोनी)   (ईश्वर सिंह बुरड़क)

 

date 22-06-2018

श्रीमति वसुन्धरा राजे जी,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- राजस्थान के टीएसपी (आदीवासी) क्षेत्र में नियुक्ति एवं ट्रांसफर के नाम पर
करोड़ो का घोटाला।

महोदया,
भारत सरकार ने संविधान प्रदत्त आरक्षण पूरे देश में लागू कर रखा है लेकिन राजस्थान सरकार राजस्थान के पांच जिले यथा बासवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही एवं उदयपुर को टीएसपी (आदीवासी) क्षेत्र मानकर वहां के 1970 से पूर्व के वासिन्दों को आरक्षण देने के नाम पर एससी का आरक्षण 16 से 5 प्रतिशत कर दिया एवं ओबीसी का आरक्षण खत्म कर दिया। यह कार्य एक संगठित गिरोह द्वारा करवाया जा रहा है जो इन जिलों के बाहर के लोगों के टीएसपी क्षेत्र के मूल निवास प्रमाण पत्र बनवाकर उनको नियुक्ति दिलवाता है, नियुक्ति के बाद उनका ट्रांसफर उनके गृह जिले में करवा देता है। टीएसपी के पंाचों जिलों में वहां पर नियुक्त कर्मचारियेां के ट्रांसफर होने से रिक्त पद हो जाते है उन रिक्त पदों पर पुनः नये लोगों को नियुक्तियां दिलवाते है। एक अभ्यर्थी से नियुक्ति के नाम पर एवं ट्रांसफर के नाम पर दो बार लाखों रूपये लिये जाते है।
अतः आपसे निवेदन है कि राज्य सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार टीएसपी क्षेत्र में नियुक्त समस्त कर्मचारियों के 1970 से पूर्व वहां पर निवास करने का प्रमाणों पत्रों की जांच सीबीआई से करवाकर उक्त घोटाले को उजागर करवाकर दोषी पाये जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करवाने की कृपा करें।
सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
आरक्षण अधिकार मंच

 

Date 11-6-2018

श्रीमति वसुन्धरा राजे जी,
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषयः- आरक्षण को लागू करने के लिये अधिनियम के तहत प्रक्रिया निर्धारित करने के
सम्बन्ध में।
महोदया,
निवेदन है कि राजस्थान सरकार की आरक्षण नीति को लागू करने के सम्बन्ध में संक्षिप्त एक्ज्यूक्यूटिव आर्डर है। जिसके परिणाम स्वरूप राजस्थान लोक सेवा आयोग, राजस्थान अधीनस्थ मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड, नियुक्ति प्राधिकारी, अधिकारीगण तथा न्यायालय आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया की मनमानी व्याख्या करते है और न्यायालयों का अनावश्यक हस्तक्षेप होता है जिसकी वजह से भर्ती प्रक्रिया दशकों में जाकर पूरी होती है जिसका दुष्परिणाम राज्य प्रशासन एवं बैरोजगार अभ्यर्थियों को भूगतना तो पड़ ही रहा है बल्कि विचारणिय स्थिति यह है कि आरक्षित वर्ग के आरक्षण को मात्र सांकेतिक स्थिति में ला दिया है तथा राज्य की 15 प्रतिशत से कम अनारक्षित जातियों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। इस प्रकार आरक्षण की स्थिति को संविधान के प्रावधानों उल्लघन एवं राज्य की नीति के बिलकूल विपरीत स्थिति में ला दिया है।
अतः हमारा निवेदन है कि राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू करने के लिये अधिनियम द्वारा प्रक्रिया विस्तृरित रूप से निर्धारित किया जाये जिससे कि चयन प्राधिकारियों, आयोग, बोर्ड एवं न्यायालयों का हस्तक्षेप कम से कम हो तथा भर्ती प्रक्रिया में कोई रूकावट नही आये।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान जाट महासभा एवं आरक्षण अधिकार मंच ने इस सम्बन्ध में सरकार को स्थिति से विस्तार में कई बार अवगत कराया है लेकिन अफसोस का विषय है कि राज्य सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई ध्यान नही दिया है।
(राजाराम मील)

Date 9-6-2018

आरक्षण के साथ हो रहे छेड़-छाड़ के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखकर समाधान के लिये निवेदन किया

श्री नरेन्द्र मोदी,
माननीय प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।

विषयः- आरक्षण से छेड़छाड़ के सम्बन्ध में।

महोदय,
उपरोक्त विषय में निवेदन है कि राजस्थान में 85 प्रतिशत आरक्षित वर्ग (एससी, एसटी, ओबीसी, एसबीसी, महिला, विकलांग, उत्कृष्ट खिलाड़ी एवं भूतपूर्व सैनिक) रहता है। सरकार में नियुक्त कुछ मनुवादी सोच के अधिकारी जिनको सरकार द्वारा न तो प्रशिक्षण दिया गया है और न ही उन्हें आरक्षण नियमों का ज्ञान है। ये अधिकारी मृतक आश्रित आरक्षण को छोड़कर अन्य सभी आरक्षित वर्ग से चिड़ते है एवं उनको नुकसान पहुचाने में लगे रहते है जो इस प्रकार हैः-
1. सामान्य वर्ग का गलत अर्थ निकालनाः- सुप्रीम कोर्ट के नो जजों की बैंच द्वारा सामान्य वर्ग का आशय मैरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों से लगाने बाबत फैसला दिया जा चुका है लेकिन राजस्थान के ये अधिकारी सामान्य वर्ग का अर्थ अनारक्षित वर्ग से लगाकर 8 प्रतिशत लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की कोशिश करते है। अतः हमारा निवेदन है कि कार्मिक विभाग द्वारा यह स्पष्टीकरण जारी करवाया जावे कि सामान्य वर्ग का अर्थ भर्ती प्रक्रिया एवं कार्यरत कर्मचारियों के कुल पदों की गणना में सामान्य वर्ग का अर्थ मैरिट आधार से चयनित अभ्यर्थियों से लगाया जावे।
2. एक भर्ती की एक से अधिक सूचिया जारी करने में अनियमितताः- राजस्थान लोक आयोग एवं अधिनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा एक भर्ती से एक से अधिक सूचियां बनाने पर द्वितीय सूची में आरक्षित वर्ग को मैरिट आधार पर चयन नही किया जाता। जबकि नियमानुसार आरक्षित वर्ग के अपात्र एवं नाॅनजोईनर्स के स्थान पर केवल आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी एवं सामान्य वर्ग के अपात्र एवं नाॅनजोईनर्स के स्थान पर पूरे परिणाम को रिसफल कर सभी वर्गो के अभ्यर्थियों का चयन किया जाना चाहिये। जैसे राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा लिपिक ग्रेड द्वितीय भर्ती 2013 में प्रथम सूची सचिवालय कार्यालय हेतु मैरिट के अभ्यर्थी 70 का चयन किया गया एवं द्वितीय सूची आयोग कार्यालय के लिये मैरिट के अभ्यर्थी 20 का चयन करना आयोग के समझ में नही आया। इसके लिये आयोग को सचिवालय एवं आयोग कार्यालय के लिये मैरिट वाले सारे अभ्यर्थी 70़20त्र90 का चयन मैरिट आधार पर करना चाहिये था जो आयोग द्वारा नही किया गया। आयोग कार्यालय की सूची में मैरिट क्रमांक 71 से 90 तक पूर्व चयनित आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की संख्या के बराबर आरक्षित वर्ग के दूसरे अभ्यर्थी मैरिट आधार पर चयन किये जाने चाहिये थे।
3. दण्डवत आरक्षण में सामान्य वर्ग का गलत अर्थ निकालनाः- आयोग एवं अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के अधिकारी दण्डवत आरक्षण (भूतपूर्व सैनिक, विकलांग, उत्कृष्ट खिलाड़ी एवं मंत्रालयिक कर्मचारी) में सामान्य वर्ग का अर्थ अनारक्षित वर्ग से लगाकर 8 प्रतिशत लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण देते है एवं ओबीसी के 54 प्रतिशत लोगों को 21 प्रतिशत में समायोजित करते है। अतः हमारा निवेदन है कि सामान्य वर्ग का आशय दण्डवत आरक्षण में मैरिट आधार से चयनित अभ्यर्थियों से लगाया जाये एवं मैरिट आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को ही सामान्य वर्ग में समायोजित किया जाये।
अतः हमारा निवेदन है कि भर्ती की समस्त प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता यथा, ओएमआर सीट, नाम, प्राप्तांक, वर्ग, जन्म तिथि, मैरिट क्रमांक आदि ईटरनेट पर सार्वजनिक करवाये, आरक्षण नियमों को स्कूल एवं काॅलेजों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करवाये जाये, चयनित अधिकारियों को आरक्षण नियमों का प्रशिक्षण दिया जाये एवं आरक्षण नियमों की पालना नही करने वाले अधिकारियेां की पदौन्नति एवं वेतन वृद्वियां रोकने के दण्ड से दण्डित करवाने के आदेश जारी करने की कृपा करें।
भवदीय

(राजाराम मील)
Mob 9829010221

Date 3-6-2018

एससी, एसटी एवं ओबीसी भाईयों और मित्रों आपके लिये संदेश

      हाॅल ही में एससी] एसटी एवं ओबीसी वर्ग के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दिनांक 28-5-2018 और 29-5-2018 को दो फैसले दिये गये। आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 के मामले में आरपीएससी द्वारा हर वर्ग के 15 गुना अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिये बुलाया गया था जिसमें सामान्य वर्ग की कट आॅफ 250 तथा ओबीसी की कट आॅफ 283 रही थी। इसी तरह पटवारी भर्ती परीक्षा 2015 में भी सामान्य वर्ग की कट आॅफ 104 एससी की 123 एसटी की 112 एवं ओबीसी की 148 अंक रही थी। आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 में राजस्थान हाईकोर्ट डीबी बैंच द्वारा आरक्षित एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के पक्ष में फैसला दिया था तथा पटवारी भर्ती परीक्षा 2016 का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा था उस समय आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 के अभ्यर्थी भी उसी रीट याचिका में अपना पक्ष रखा था] तत्पश्चात माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड दोनों को तलब किया था और दोनों संस्थाओं ने यह मान लिया था कि दोनों ही भर्ती परीक्षाओं में सामान्य वर्ग की कट आॅफ अंक तक के अभ्यर्थियों को बुलाया जायेगा और आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड ने सामान्य वर्ग की कट आॅफ अंक तक के अभ्यर्थियों को बुलाया भी गया था। दोनों ही भर्ती परीक्षाओं के अभ्यर्थी नौकरी कर रहे है।  

    यहां पर मैं यह भी उल्लेख करना चाहता हूं कि सामान्य वर्ग का मतलब मैरिट होता है। कुछ लोग सामान्य वर्ग को एससी, एसटी, ओबीसी की तरह का वर्ग मान रहे है अगर यह वर्ग होता तो इसका मतलब यह हुआ कि सामान्य वर्ग को 50 प्रतिशत आरक्षण है जिनकी जनसंख्या मात्र 15 प्रतिशत है लेकिन यह वर्ग नही है सामान्य वर्ग में 50 प्रतिशत उन अभ्यर्थियों को लिया जाता है जो मैरिट में आते है उसमें सभी वर्गों के अभ्यर्थी होते है जो मैरिट में है। उसके बाद 50 प्रतिशत आरक्षित वर्ग (एससी, एसटी एवं ओबीसी) से रिक्तियां भरी जाती है। लेकिन आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड उल्टा कर रही है और राजस्थान हाईकोर्ट भी उनके एवं समता मंच के हिसाब से फैसला दे रहे है।  

     यूपीएससी भर्ती परीक्षा में ऐसी धांधली कभी भी नही होती है वहां पर हर भर्ती आरक्षण नियमों से होती है इसलिये कोई भी भर्ती कोर्ट में नही जाती। लेकिन राजस्थान में पिछले 20 साल से तो मैं स्वयं देख रहा हूं कि कोई भर्ती हो सभी आरक्षित वर्ग के खिलाफ नियम बनाये जाते है और हर भर्ती कोर्ट में जाती है और अंत तक सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है।

     भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उक्त डाईरेक्शन एवं राजस्थान हाईकोर्ट के डीबी बैंच के फैसले के बाद भी राजस्थान हाईकोर्ट ने समता मंच के साथ मिलकर संविधान और सुप्रीम कोर्ट की डाईरेक्शन के विरूद्ध एवं एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के खिलाफ उक्त दोनों फैसले किये है। इसका मतलब यह हुआ कि राजस्थान हाईकोर्ट भारत के सर्वोच्च न्यायालय से भी बड़ा है और समता मंच की दायर की गई रीट याचिकाओं पर जल्दबाजी में फैसले दे देते है फैसले भी ऐसे समय में देते है जब वकिल भी हड़ताल पर रहते है ताकि सही तथ्य कोर्ट में पेश नही कर सके। इससे यह जाहिर होता है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी (आरक्षित वर्ग) के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट एवं उच्च वर्ग हाथ धोकर पीछे पड़ा हुआ है। समता मंच तो यह चाहता है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के लोग सरकारी नौकरी ही नही करे और जो अभ्यर्थी सरकारी नौकरी कर रहे है उन्हें कोर्ट में झुठै तथ्य पेश कर ऐसे फैसले करवा लेते है कि उन्हें भी हटाना पड़ेगा। ऐसा लगता है कि संवैधानिक संस्थाऐं एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के लोगों पर अत्याचार करने के लिये बनाई गई है और जो भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी नौकरी लगे हुये है उन्हें हटाने का काम कर रही है। राजस्थान सरकार भी हाईकोर्ट द्वारा दिये जा रहे फैसलों को आंख मूंदकर देख रही है जिसका परिणाम सरकार को भी भुगतना पड़ेगा। एससी, एसटी एवं ओबीसी में उक्त दोनों हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ भंयकर रोष है आने वाले दिनों में इसका साफ असर दिखेगा।

 राजाराम मील

मो0 9829010221

 

Date 13-6-2015

मुख्यमंत्री जी,
राजस्थान सरकार,
जयपुर।
विषयः- अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के सम्बन्ध में।
महोदया,
राज्य सरकार ने राज्य सरकार एवं राजकीय उपक्रमों की सेवाओं तथा षिक्षण संस्थाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये 21 प्रतिषत आरक्षण के आदेष जारी किये हुये है लेकिन बहुत से विभागों में अधिनस्थ सेवाओं में आरक्षण ठीक से लागू नही किया जा रहा है। राज्य के विष्वविद्यालय एवं काॅलेजों में भी आरक्षण को इस प्रकार लागू किया जा रहा है जिससे अनारक्षित वर्ग को 50 प्रतिषत आरक्षण दिया जा रहा है। पिछड़ा वर्ग अनु0जाति एवं जनजाति के आरक्षण को लागू करने में निम्नलिखित प्रकार से अनियमितताऐं की जा रही हैः-

1. राज्य में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग का 50 प्रतिषत आरक्षण है तथा शेष 50 प्रतिषत सीटे अनारक्षित है। आरक्षण नीति को लागू करने का तरीका यह है कि सबसे पहले 50 प्रतिषत अनारक्षित पदों पर मेरिट के आधार पर नियुक्ति/प्रवेष दे दिया जाये जिसमें सभी वर्गों के अभ्यर्थी सम्मिलित होगे। इसको सामान्य वर्ग की संज्ञा दी जाती है इसके पष्चात सामान्य वर्ग के अन्तिम अभ्यर्थी के नीचे के मेरिट के अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर उनके आरक्षित वर्ग में नियुक्ति दी जानी चाहिये। कुछ विभाग एवं षिक्षण संस्थाऐं जब आरक्षण को लागू करते है तो अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को मेरिट सूची से निकालकर अलग सूची बना देते है। परिणाम स्वरूप मेरिट सूची में षेष रहे अभ्यर्थी केवल मात्र अनारक्षित वर्ग के रह जाते है। इन अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 50 प्रतिषत पदो के विरूद्ध नियुक्ति/प्रवेष दे दिया जाता है। इस प्रकार से 50 प्रतिषत पद अनारक्षित वर्ग के लिये आरक्षित हो जाते है। इन अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी की संज्ञा दी जाती है अर्थात सामान्य श्रेणी में केवल मात्र अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति/प्रवेष दे दिया जाता है।
2. अनुसूचित जाति का आरक्षण 16 प्रतिषत अनुसूचित जन जाति का 12 का प्रतिषत तथा पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 21 प्रतिषत है लेकिन इन वर्गों के अभ्यर्थी 50 प्रतिषत अनारक्षित (सामान्य वर्ग) के पदों के लिये भी प्रतियोगी होते है। इस प्रकार अनुसूचित जाति का अभ्यर्थी 66 प्रतिषत अनुसूचित जनजाति का अभ्यर्थी 62 प्रतिषत तथा अन्य पिछडा वर्ग का अभ्यर्थी 71 प्रतिषत पदो के लिये प्रतियोगी होता है। कुछ विभाग चयन के लिये साक्षात्कार रखते है जिसमें पदों के तीन गुणा अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाते है। ऐसे मामलों में चयन प्राधिकारी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके केवल आरक्षण के कोटे के तीन गुना अभ्यर्थियों को बुलाते है तथा अनारक्षित 50 प्रतिषत पदो के तीन गुना पदो को सम्मिलित नही करते उदाहरण के लिये यदि 100 पदों की भर्ती है तो अन्य पिछड़ा वर्ग के 21 प्रतिषत का तीन गुना अर्थात 63 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाते है जबकि पिछडे वर्ग के अभ्यर्थी 71 पदों के लिये प्रतियोगी होते है अतः पिछड़ा वर्ग के 71ग3 अर्थात 213 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाना चाहिये। ऐसे मामलों में पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों तथा मेरिट कटआॅफ अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से काफी उंचा रह जाता है और आरक्षण प्रतिषत षून्य ही नही हो जाता बल्कि जो अभ्यर्थी मेरिट के आधार पर अनारक्षित वर्ग में नियुक्ति पाने के अधिकारी है उन्हें भी आरक्षित वर्ग में नियुक्ति दे दी जाती है।
3. संविधान की धारा 16 में संषोधन के जरीये यह प्रावधान किया हुआ है कि अनु0जाति, जनजाति के बैकलाॅग के मामलें में 50 प्रतिषत से अधिक आरक्षण का सिद्धान्त लागू नही होगा, लेकिन अधिकांष विभाग संविधान के उपरोक्त प्रावधानों को अनदेखा करते हुये अनु0जाति, जनजाति के बैकलाॅग के मामलों में भी 50 प्रतिषत से अधिक आरक्षण नही होने का सिद्धान्त लागू करते हुये अनु0जाति, जनजाति के निर्धारित कोटे से अधिक बैकलाॅग के पदों के विरूद्ध अन्य पिछड़ा वर्ग के पदों को कम कर देते है जबकि अनु0जाति,जनजाति के बैकलाॅग के मामले में अनारक्षित पदों को कम किया जाना चाहिये न कि अन्य पिछड़ा वर्ग के पदो को।
4. कुछ विभाग भर्ती के समय आरक्षित वर्ग के पदों की गणना गलत कर लेते है। आरक्षित वर्गों के पदों की गणना के मामलें में यदि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी उनके निर्धारित कोटे से अधिक है चाहे वे मेरिट के आधार पर आये हो या पिछड़ा वर्ग का आरक्षण लागू होने से पहले आये हो उन्हें भी उनके आरक्षित वर्ग में गिना जाकर आरक्षित वर्ग के निर्धारित कोटे से अधिक यदि उस वर्ग के कर्मचारी है तो उस विभाग की नई भर्ती में उस वर्ग की रिक्तियों को उतना कम कर दिया जाता है जितने अभ्यर्थी उस वर्ग के उनके निर्धारित कोटे अधिक है। ये व्यवस्था राज्य सरकार की आरक्षण नीति के विरूद्ध है। हालांकि अनु0जाति, जनजाति के अभ्यर्थी सामान्यतया किसी संवर्ग में उनके निर्धारित कोटे से अधिक नही होते लेकिन अन्य पिछडा वर्ग के अभ्यर्थी अनारक्षित पदों पर भी मेरिट के आधार पर आते है ऐसी स्थिति में इस प्रक्रिया में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण विपरीत रूप से प्रभावित हो रहा है।
5. अनारक्षित वर्ग में महिलाओं के आरक्षण में केवल मात्र अनारक्षित वर्ग की महिलाओं को ही आरक्षण दिया जा रहा है जबकि अनारक्षित वर्गों पर सभी वर्गों का समान अधिकार है। अतः अनारक्षित वर्ग में महिलाओं का आरक्षण भी मेरिट के आधार पर सभी वर्ग की महिलाओं को होना चाहिये।
6. अनारक्षित वर्ग पर नियुक्ति दिये गये जो अभ्यर्थी सेवा ज्याईन नही करते है उनके स्थान पर मेरिट के आधार पर ही नये अभ्यर्थियों को मौका देना चाहिये और ऐसी मेरिट में यदि आरक्षित वर्ग के ऐसे अभ्यर्थी हो जिन्हें उनके वर्ग में आरक्षण के आधार पर नियुक्ति दे दी गई है उन्हें अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति सूची में रखा जाना चाहिये तथा इस प्रकार आरक्षित वर्ग में रिक्त हुये स्थानों को भी आरक्षित अभ्यर्थियों से भरना चाहिये लेकिन इस नियम की पालना नही की जा रही यहां तक कि लोक सेवा आयोग भी इस नियम की पालना नही कर रहा है।
7. नियुक्तियों एवं प्रवेष के मामलें में मेरिट क्रमांक, मेरिट नम्बरों का प्रतिषत, आरक्षण की स्थिति इत्यादि विभाग/षिक्षण संस्थान की वेबसाईट पर प्रदर्षित करनी चाहिये जिससे कि पारदर्षिता दिखे। लेकिन अधिकांष विभाग अपनी गलतियों को छुपाने के लिये नियुक्तियों में पारदर्षिता नही बरतते तथा उपरोक्त उल्लेखित स्थिति को वेबसाईट पर प्रदर्षित नही करते।
8. राज्य सरकार का आदेष है कि एकल पद पर आरक्षण नही होगा। इन आदेषों की ओट में कुछ विभाग विषेषतः विष्वविद्यालयों में प्रत्येक विभाग के प्रत्येक विषय के सहायक प्रोफेसर, एसोसियट प्रोफेसर एवं प्रोफेसर के पदों को एकल पद मानकर इन पदों को आरक्षण से बाहर कर दिया है। उदाहरणार्थ राजस्थान संस्कृत विष्वविद्यालय।
9. नेषनल विधि विष्वविद्यालय जोधपुर राज्य सरकार द्वारा स्थापित विष्वविद्यालय है लेकिन यह विष्वविद्यालय राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू नही कर रहा है।
10. राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू नही करने तथा आरक्षण को विकृत करने, अनारक्षित वर्ग को 50 प्रतिषत आरक्षण देने तथा उपरोक्त प्रकार की त्रुटियों के मामलें में राज्य सरकार ने आजतक न तो किसी नियुक्ति अधिकारी से प्रष्न किया है और न ही किसी नियुक्ति अधिकारी को दण्डित किया है। ऐसी स्थिति में नियुक्ति अधिकारी राज्य सरकार की आरक्षण नीति को मनमाने तरीके से लागू कर रहे है।

उपरोक्त परिपेक्ष्य में हमारा निवेदन है कि राज्य सरकार के स्तर से एक बार पुनः समस्त नियुक्ति अधिकारियों एवं षिक्षण संस्थानों को निर्देष दिये जाये कि वे नियुक्तियों एवं प्रवेष में उपर उल्लेखित त्रुटियां नही करे। साथ ही ये भी निवेदन है कि कार्मिक विभाग में आरक्षण पर निगरानी के लिये एक सेल स्थापित किया जाये तथा जो भी विभाग नियुक्तियों के लिये विज्ञापन जारी करे तथा नियुक्तियों जारी करे उससे पूर्व कार्मिक विभाग के आरक्षण सेल से प्रक्रिया का अनुमोदन करवा ले।

सादर।
भवदीय

(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा

 

राज्य सरकार ने राज्य सरकार एवं राजकीय उपमों की सेवाओं तथा  शिक्षण संस्थाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये 21 प्रतिशत आरक्षण के आदेश जारी किये हुये है लेकिन बहुत से विभागों में अधिनस्थ सेवाओं में आरक्षण ठीक से लागू नही किया जा रहा है। राज्य के विश्वविघयाल एवं कॉलेजों में भी आरक्षण को इस प्रकार लागू किया जा रहा है जिससे अनारक्षित वर्ग को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। पिछड़ा वर्ग अनु0जाति एवं जनजाति के आरक्षण को लागू करने में निम्नलिखित प्रकार से अनियमितताऐं की जा रही है:-

1. राज्य में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग का 50 प्रतिशत आरक्षण है तथा शेष 50 प्रतिशत सीटे अनारक्षित है। आरक्षण नीति को लागू करने का तरीका यह है कि सबसे पहले 50 प्रतिशत  अनारक्षित पदों पर मेरीट के आधार पर नियुक्ति/प्रवेश  दे दिया जाये जिसमें सभी वर्गों के अभ्यर्थी सम्मिलित होगे। इसको सामान्य वर्ग की संज्ञा दी जाती है इसके पश्चात सामान्य वर्ग के अन्तिम अभ्यर्थी के नीचे के मेरीट के अभ्यर्थियों को मेरीट के आधार पर उनके आरक्षित वर्ग में नियुक्ति दी जानी चाहिये। कुछ विभाग एवं  शिक्षण संस्थाऐं जब आरक्षण को लागू करते है तो अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को मेरीट सूची से निकालकर अलग सूची बना देते है। परिणाम स्वरूप मेरीट सूची में शेष रहे अभ्यर्थी केवल मात्र अनारक्षित वर्ग के रह जाते है। इन अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 50 प्रतिशत  पदो के विरूद्ध नियुक्ति/प्रवेश  दे दिया जाता है। इस प्रकार से 50 प्रतिशत  पद अनारक्षित वर्ग के लिये आरक्षित हो जाते है। इन अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी की संज्ञा दी जाती है अर्थात सामान्य श्रेणी में केवल मात्र अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति/प्रवेश   दे दिया जाता है।

2. अनुसूचित जाति का आरक्षण 16 प्रतिशत अनुसूचित जन जाति का 12 का प्रतिशत तथा पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 21 प्रतिशत है लेकिन इन वर्गों के अभ्यर्थी 50 प्रतिशत अनारक्षित (सामान्य वर्ग) के पदों के लिये भी प्रतियोगी होते है। इस प्रकार अनुसूचित जाति का अभ्यर्थी 66 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति का अभ्यर्थी 62 प्रतिशत तथा अन्य पिछडा वर्ग का अभ्यर्थी 71 प्रतिशत पदो के लिये प्रतियोगी होता है। कुछ विभाग चयन के लिये साक्षात्कार रखते है जिसमें पदों के तीन गुणा अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाते है। ऐसे मामलों में चयन प्राधिकारी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके केवल आरक्षण के कोटे के तीन गुना अभ्यर्थियों को बुलाते है तथा अनारक्षित 50 प्रतिशत पदो के तीन गुना पदो को सम्मिलित नही करते उदाहरण के लिये यदि 100 पदों की भर्ती है तो अन्य पिछड़ा वर्ग के 21 प्रतिशत का तीन गुना अर्थात 63 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाते है जबकि पिछडे वर्ग के अभ्यर्थी 71 पदों के लिये प्रतियोगी होते है अत: पिछड़ा वर्ग के 71ग3 अर्थात 213 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये बुलाना चाहिये। ऐसे मामलों में पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों तथा मेरिट कट आँफ अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से काफी उंचा रह जाता है और आरक्षण प्रतिशत शुन्य ही नही हो जाता बल्कि जो अभ्यर्थी मेरिट के आधार पर अनारक्षित वर्ग में नियुक्ति पाने के अधिकारी है उन्हें भी आरक्षित वर्ग में नियुक्ति दे दी जाती है।

3. संविधान की धारा 16 में संशोधन के जरीये यह प्रावधान किया हुआ है कि अनु0जाति, जनजाति के बैकलॉग के मामलें में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण का सिद्धान्त लागू नही होगा, लेकिन अधिकांश विभाग संविधान के उपरोक्त प्रावधानों को अनदेखा करते हुये अनु0जाति, जनजाति के बैकलॉग के मामलों में भी 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नही होने का सिद्धान्त लागू करते हुये अनु0जाति, जनजाति के निर्धारित कोटे से अधिक बैकलॉग के पदों के विरूद्ध अन्य पिछड़ा वर्ग के पदों को कम कर देते है जबकि अनु0जाति,जनजाति के बैकलॉग के मामले में अनारक्षित पदों को कम किया जाना चाहिये न कि अन्य पिछड़ा वर्ग के पदो को।

4. कुछ विभाग भर्ती के समय आरक्षित वर्ग के पदों की गणना गलत कर लेते है। आरक्षित वर्गों के पदों की गणना के मामलें में यदि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी उनके निर्धारित कोटे से अधिक है चाहे वे मेरीट के आधार पर आये हो या पिछड़ा वर्ग का आरक्षण लागू होने से पहले आये हो उन्हें भी उनके आरक्षित वर्ग में गिना जाकर आरक्षित वर्ग के निर्धारित कोटे से अधिक यदि उस वर्ग के कर्मचारी है तो उस विभाग की नई भर्ती में उस वर्ग की रिक्तयो को उतना कम कर दिया जाता है जितने अभ्यर्थी उस वर्ग के उनके निर्धारित कोटे अधिक है। ये व्यवस्था राज्य सरकार की आरक्षण नीति के विरूद्ध है। हालांकि अनु0जाति, जनजाति के अभ्यर्थी सामान्यतया किसी संवर्ग में उनके निर्धारित कोटे से अधिक नही होते लेकिन अन्य पिछडा वर्ग के अभ्यर्थी अनारक्षित पदों पर भी मेरीट के आधार पर आते है ऐसी - स्तिथि में इस प्रकिया में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण विपरीत रूप  से प्रभावित हो रहा है।

5. अनारक्षित वर्ग में महिलाओं के आरक्षण में केवल मात्र अनारक्षित वर्ग की महिलाओं को ही आरक्षण दिया जा रहा है जबकि अनारक्षित वर्गों पर सभी वर्गों का समान अधिकार है। अत: अनारक्षित वर्ग में महिलाओं का आरक्षण भी मेरीट के आधार पर सभी वर्ग की महिलाओं को होना चाहिये।

6. अनारक्षित वर्ग पर नियुक्ति दिये गये जो अभ्यर्थी सेवा ज्याईन नही करते है उनके स्थान पर मेरीट के आधार पर ही नये अभ्यर्थियों को मौका देना चाहिये और ऐसी मेरीट में यदि आरक्षित वर्ग के ऐसे अभ्यर्थी हो जिन्हें उनके वर्ग में आरक्षण के आधार पर नियुक्ति दे दी गई है उन्हें अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति  सूची में रखा जाना चाहिये तथा इस प्रकार आरक्षित वर्ग में रिक्त हुये स्थानों को भी आरक्षित अभ्यर्थियों से भरना चाहिये लेकिन इस नियम की पालना नही की जा रही यहां तक कि लोक सेवा आयोग भी इस नियम की पालना नही कर रहा है।

7. नियुक्तियो एवं प्रवेश  के मामलें में मेरीट क्रमांक, मेरीट नम्बरों का प्रतिशत , आरक्षण की – स्तिथि इत्यादि विभाग/शिक्षण संस्थान की वेबसाईट पर प्रदर्शित  करनी चाहिये जिससे कि पारदर्शित दिखे। लेकिन अधिकांश  विभाग अपनी गलतियों को छुपाने के लिये नियुक्तियों में पारदर्शित नही बताते तथा उपरोक्त उल्लेखित -स्तिथि को वेबसाईट पर प्रदर्शित  नही करते।

8. राज्य सरकार का आदेश है कि एकल पद पर आरक्षण नही होगा। इन आदेशो  की ओट में कुछ विभाग  विशेषत  विश्वविघयालयों में प्रत्येक विभाग के प्रत्येक विषय के सहायक प्राेफेसर, एसोसियट प्राेफेसर एवं प्राेफेसर के पदों को एकल पद मानकर इन पदों को आरक्षण से बाहर कर दिया है। उदाहरणार्थ राजस्थान संस्कृत विश्वविघयाल।

9. नेनाल विश्वविघयाल जोधपुर राज्य सरकार द्वारा स्थापित विश्वविघयालय  है लेकिन यह विश्वविघयालय राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू नही कर रहा है।

10. राज्य सरकार की आरक्षण नीति को लागू नही करने तथा आरक्षण को विकृत करने, अनारक्षित वर्ग को 50 प्रतिशत  आरक्षण देने तथा उपरोक्त प्रकार की त्रुटियों के मामलें में राज्य सरकार ने आजतक न तो किसी नियुक्ति अधिकारी से प्रश्न किया है और न ही किसीनियुक्ति  अधिकारी को  द-ण्डत किया है। ऐसी -स्तिथि में नियुक्ति  अधिकारी राज्य सरकार की आरक्षण नीति को मनमाने तरीके से लागू कर रहे है।

राजस्थान जाट महासभा ने आरक्षण की व्यवस्था को उपरोक्तानुसार सही ठंग से लागू किये जाने तथा अनियमतताओं पर रोक के लिये मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार को निवेदन किया है। इस सम्बन्ध में पूर्व में राजस्थान लोकसेवा आयोग राजस्थान विश्वविघयालय, राजस्थान के मुख्य सचिव, राजस्थान के राज्यपाल, कार्मिक विभाग राजस्थान सरकार तथा अन्य सम्बधित विभागों को समय-समय पर पत्र लिखकर लगातार निवेदन किया जा रहा है।


भारत सरकार के विभिन्न विभागों, उपक्रमो, बैंको एवं अन्य संस्थानों में राजस्थान के जाटों को आरक्षण सम्बधित भ्रांति के सम्बन्ध में लिखे गये पत्र की प्रति।

डॉ0 जितेन्द्र सिंह,
मंत्री, कार्मिक, लोक शिकायात एवं पेन्ना  (कार्मिक एवं प्रशिक्षण) विभाग,
नई दिल्ली।

विषय:- राजस्थान के जाट जाति को आरक्षण के सम्बन्ध में।

महोदय,
निवेदन है कि भारत सरकार की अधिसूचना सं. 12011/68/98-बी.सी.सी. दिनांक 27.10.99 द्वारा राजस्थान की जाट जाति को (भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को छोड़कर) भारत सरकार की अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित किया था जिसकी प्रति संलग्न है। भारत सरकार की उक्त अधिसूचना आज भी प्रभाव में है अर्थात राजस्थान की जाट जाति (भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को छोड़कर) भारत सरकार, भारत सरकार के उपक्रमो एवं भारत सरकार की राष्ट्रीयकृत बैंको में आरक्षण की सूची में है।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने राम सिंह बनाम यूनियन आँफ इणि्डया निर्णय दिनांक 17.3.2015 में बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली राजधानी क्षेत्र, राजस्थान के भरतपुर और धौलपुर जिले, उत्तर प्रदेश और उतराखण्ड की जाट जाति को भारत सरकार की आरक्षण सूची में सम्मिलित किये जाने की अधिसूचना क्रमांक 63 दिनांक 4.3.2014 को निरस्त किया है। उक्त निर्णय द्वारा राजस्थान के जाट जाति (भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को छोड़कर) की आरक्षण की अधिसूचना दिनांक 27.10.99 अप्रभावित है। यह भी उल्लेखनीय है कि उपर उल्लेखित राज्यों की राज्य सरकारों द्वारा जाट जाति को उनके राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित किये जाने की अधिसूचनाऐं भी उच्चतम न्यायालय के निर्णय दिनांक 17.3.2015 से अप्रभावित है।
अभी कर्मचारी चयन आयोग द्वारा सीपीओ एस आई परीक्षा 2014 का परिणाम दिनांक 31.3.2015 को जारी किया गया है जिसमें यद्पि राजस्थान राज्य सहित सभी नो राज्यों के अभ्यार्थियों को अन्य पिछड़ा वर्ग मे मानकर परीक्षा परिणाम जारी किया गया था लेकिन आयोग ने सुपिम कोर्ट के निर्णय दिनांक 17.3.2015 के परिपेक्ष्य में अन्य राज्यों के साथ-साथ राजस्थान के जाट जाति के चयनित अभ्यार्थियों की नियुक्ति  भी रोक दी है जबकि सुपिम कोर्ट के निर्णय में राजस्थान की जाट जाति को भारत सरकार की अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित किये जाने की अधिसूचना दिनांक 27.10.99 न तो चुनोती में थी और न ही प्रभावित है अर्थात राजस्थान की जाट जाति को (भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को छोड़कर) भारत सरकार की सेवाओं में आरक्षण यथावत प्राप्त है।
अत: कृपया राजस्थान के जाट जाति के (भरतपुर और धौलपुर जिले के जाटों को छोड़कर) चयनित अभ्यार्थियों की नियुक्ति  के प्रस्ताव शीघ्र सम्बधित विभागों को प्रेषित किये जाये।
सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा


नेनाल विधि   विश्वविद्यालय में आरक्षण के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री जी, राजस्थान सरकार को लिखे पत्र की प्रति  11.6.2015

 

मुख्यमंत्री जी,

राजस्थान सरकार,

जयपुर।

विषय:- नेनाल  विधि  विश्वविद्यालय जोधपुर में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के सम्बन्ध में।

महोदया,
नेनाल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर राजस्थान विधानसभा के अधिनियम द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय है अत: ये विश्वविद्यालय पूर्णत्या राज्य सरकार का उपक्रम है। राज्य सरकार ने एक एक्जिटिव आदेश द्वारा राज्य के सभी विश्वविद्यालय , कॉलेजों एवं उच्च -शिक्षण संस्थाओं की सेवाओं एवं प्रवेश में एस सी, एस टी एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण किया हुआ है लेकिन नेनाल विधि  विश्वविद्यालय जोधपुर राज्य सरकार के आरक्षण से सम्बधित  उपरोक्त आदेश की पालना नही कर रहा है तथा इस विश्वविद्यालय में अन्य पिछड़े वर्ग का कोई आरक्षण नही है। यहां तक कि एस सी व एसटी का आरक्षण भी वैकल्पिक है। प्रारम्भ में जब इस विश्वविद्यालय को स्थापित करने का अधिनियम बनाया गया था उस अधिनियम में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान था लेकिन तत्प’चात तत्कालीन विधि  मंत्री ने पिछडे वर्ग के विरूद्ध एक षडयंत्र के तहत अधिनियम में एक संशोधन करवाकर पिछड़े वर्ग के आरक्षण को समाप्त करवा दिया।
इस विधि   विश्वविद्यालय की स्थापना इस उदेश्य से की गई थी कि विधि  विज्ञान से सम्बधित   उत्कृष्ट श्रेणी के विद्यार्थी तैयार किये जाये जो आगे चलकर राज्य की विधि सेवाओं तथा उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हो तथा उत्कृष्ट श्रेणी के अधिवक्ता बने। उल्लेखनीय है कि राजस्थान उच्च न्यायालय की स्थापना से अब तक इस उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता कोटे से अनु0जाति, जनजाति तथा पिछड़ी जाति का केवल मात्र एक अधिवक्ता नियुक्त हुआ है। अनु0जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के विरूद्ध षड़यंत्र के तहत ही नेनाल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर पिछड़ा वर्ग के छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश में आरक्षण नही दे रहा है।

उल्ल्खनीय है कि इस विश्वविद्यालय की शासकीय परिषद के अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश है। अत: निवेदन है कि नेनाल विधि विश्वविद्यालय जोधपुर में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण विश्वविद्यालय  के अधिनियम में संशेाधन कर प्रावधान किया जाये जिससे कि विश्वविद्यालय राज्य सरकार की नीति एंव आदेशेा की अवहेलना नही कर सके।

सादर।
भवदीय
(राजाराम मील)
अध्यक्ष
राजस्थान जाट महासभा